MP News: उमंग सिंघार का BJP सरकार को अल्टीमेटम, “15 दिन में अधिकार नहीं लौटे तो होगा जन आंदोलन
MP congress: मध्य प्रदेश की सियासत एक बार फिर आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर गरमा गई है। राजधानी भोपाल में आयोजित एक संयुक्त पत्रकार वार्ता में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य कमलेश्वर पटेल ने भाजपा सरकार पर वन अधिकार अधिनियम 2006 को ठप्प करने, आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने, और कॉरपोरेट हितों के लिए जनजातीय समाज को उजाड़ने का आरोप लगाया।
वार्ता की सबसे तीखी लाइन आई उमंग सिंघार के मुंह से - "जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले आदिवासियों को धर्मों में बांटा जा रहा है। भाजपा अब जंगल पर कब्जा चाहती है, और जंगल के रक्षक आदिवासियों को ही अपराधी बताया जा रहा है।"

वन अधिकार अधिनियम बना 'कागज़ी कानून'?
वन अधिकार अधिनियम को लागू हुए 17 साल हो चुके हैं, लेकिन कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि भाजपा शासन में यह अधिनियम सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गया है।
- 8 लाख से अधिक दावे देशभर में लंबित
- मध्यप्रदेश में 6.5 लाख दावों में से 3 लाख खारिज
- खारिजीकरण में कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया गया
उमंग सिंघार ने कहा, "नियम 12A के अनुसार, हर खारिज दावे पर लिखित कारण देना अनिवार्य है, लेकिन यहां न कारण दिया गया, न सूचना। यह तो 'बेदखली का षड्यंत्र' है।"
खनिज के पीछे खौफनाक मंशा? नेपानगर का जिक्र गरमाया
सिंघार ने आरोप लगाया कि नेपानगर के जंगलों में खनिज संपदा की लालच में सरकार आदिवासियों को जबरन विस्थापित कर रही है। "सरकार कहती है कि आदिवासी जंगल काट रहे हैं, लेकिन असल में वही आदिवासी जंगल को बचा रहे हैं। असली नुकसान पहुंचाने वाले तो वे हैं जिन्हें सरकार संरक्षण दे रही है।"
कांग्रेस का चेतावनी भरा स्वर: 15 दिन का अल्टीमेटम
नेता प्रतिपक्ष ने सरकार को 15 दिन का समय देते हुए दो टूक कहा:"अगर 15 दिनों में आदिवासियों को पट्टे और उनका हक वापस नहीं मिला, तो कांग्रेस सड़क से विधानसभा तक आंदोलन करेगी। ये सिर्फ हक की नहीं, अस्तित्व की लड़ाई है।"
'धर्म नहीं, धरती हमारी पहचान है'
सिंघार ने भाजपा और RSS पर आरोप लगाते हुए कहा: "आदिवासी प्रकृति की पूजा करता है। वह जंगलों को बचाता है, नष्ट नहीं करता। लेकिन भाजपा हमें धर्म की राजनीति में उलझा रही है। वह गांव-गांव जाकर आदिवासियों को बांटने का काम कर रही है।"
अन्य नेताओं ने क्या कहा?
अरुण यादव - "यह कॉरपोरेट गठजोड़ है" "सरकार आदिवासियों को जंगल से हटाकर कॉरपोरेट कंपनियों के लिए जमीन खाली करवा रही है। यह पूरी प्रक्रिया जनविरोधी और पर्यावरण विरोधी है।" उन्होंने खासकर नेपानगर और अन्य जंगल क्षेत्रों में आदिवासियों के विस्थापन को लेकर गहरी चिंता जताई।
कमलेश्वर पटेल - "अदानी का नाम लिया, सिंगरौली का जिक्र"
"सिंगरौली में अदानी कंपनी आदिवासियों का शोषण कर रही है। सरकार की चुप्पी साफ इशारा करती है कि वह साझेदार बनी हुई है।" उन्होंने मांग की कि जिन आदिवासियों को पट्टा मिला है, वह विरासत के रूप में उनके बच्चों को भी मिले, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह सके।
मूल बातें एक नजर में:
- बिंदु आंकड़े/जानकारी
- वन अधिकार अधिनियम लागू 2006
- लंबित दावे (देशभर) 8 लाख+
- मध्यप्रदेश में दावे 6.5 लाख
- खारिज दावे (MP में) 3 लाख+
- पट्टे मिले केवल झाबुआ में 5
कहां जा रही है सियासत?
कांग्रेस इस मुद्दे को जनाधार विस्तार का जरिया बना सकती है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भाजपा के खिलाफ इस तरह की रणनीति उसे 2028 विधानसभा चुनाव के लिए जनसंघर्ष के मोर्चे पर मज़बूती दे सकती है। वहीं, भाजपा के लिए यह दोधारी तलवार है-एक तरफ विकास की बात, दूसरी तरफ परंपरागत वनवासियों की नाराजगी।
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