Ashish Patel : वो DSP जो 'मृत' लड़की को 10 साल बाद जिंदा ढूंढ लाया, 17 अफसर मान चुके थे हार
झाबुआ, 7 जनवरी। ये हैं आशीष टीआर पटेल। मध्य प्रदेश के काबिल पुलिस अफसर हैं। इन्होंने अपनी काबिलियत साबित भी की है। जो काम मध्य प्रदेश पुलिस में डीएसपी रैंक के 17 अफसर नहीं कर पाए वो उप पुलिस अधीक्षक आशीष पटेल ने कर दिखाया है।

10 साल से लापता महिला को तलाश किया
दरअसल, डीएसपी आशीष पटेल ने एक ऐसी महिला को खोज निकाला है, जिसे पूरा परिवार बीते 10 साल से मृत मान रहा था। यहीं नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के डेढ़ दर्जन पुलिस अफसर भी इस केस में हार मान चुके थे।

डीएसपी आशीष पटेल का इंटरव्यू
वन इंडिया हिंदी से बातचीत में DSP आशीष पटेल ने बताया कि जब 18वें जांच अधिकारी के रूप में उनके पास यह मामला आया तो उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया और उस 27 साल की महिला को ढूंढ लिया जो 17 साल की उम्र में लापता हुई थी।

रेला कोटड़ा गांव की रहने वाली है संतोषी
पूरा मामला मध्य प्रदेश जिले के झाबुआ जिले के पेटलावद विकासखंड के गांव रेला कोटड़ा का है। यहां के कालू मोरी की बेटी संतोषी मोरी मई 2011 में 17 की उम्र में अचानक लापता हो गई थी। परिजनों ने अपने स्तर पर बेटी की खूब तलाश की। कोई सुराग नहीं मिलने पर झाबुआ जिले के पेटलावद पुलिस थाने में उसकी गुमशुदगी लिखवा दी।
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तालाब में नहाने की कहकर निकली थी संतोषी
दरअसल, साल 2011 में कालू मोरी की बेटी संतोषी मोरी किसी बात को लेकर नाराज थी। वह तालाब में नहाने की कहकर घर से निकली थी, मगर वापस नहीं लौटी। परिजनों व पुलिस उसकी खूब तलाश की। फिर परिजन ये मान बैठे थे कि उनकी बेटी को तालाब में मगरमच्छ खा गया होगा। परिजनों के साथ-साथ ग्रामीण भी उसे मृत मान चुके थे।

Ashish Patel Dy SP महिला सुरक्षा झाबुआ
इधर, झाबुआ में महिला सुरक्षा सेल के डीएसपी पद आशीष पटेल की पोस्टिंग हुई। लगभग बंद हो चुका संतोषी मोरी लापता केस झाबुआ एसपी ने डीएसपी आशीष पटेल को सौंपा। डीएसपी पटेल ने नए सिरे से शुरू की। पूर्व में जांच कर चुके 17 पुलिस अधिकारियों से थोड़ा अलग तरीका अपनाया। नतीजा हम सबके सामने है।

शादी के लिए बेचने की आशंका
उप पुलिस अधीक्षक आशीष पटेल कहते हैं कि संतोषी मोरी केस की जांच में कई मनोवैज्ञानिक चुनौतियां भी थी। मसलन यह लड़की आदिवासी समुदाय से है। इस समुदाय में एक प्रथा की लड़की की शादी के वक्त दूल्हे पक्ष से दुल्हन पक्ष पैसे लेता है। ऐसे में ये भी आशंका थी कि कहीं उसे पैसे के लालच में बेच दिया गया होगा।

मगरमच्छ थे ही नहीं गांव के तालाब में
दूसरी चुनौती यह थी कि परिवार और पूरा गांव यह मानकर चलकर रहा था कि लड़की को मगरमच्छ खा गया। जो दस साल में किसी के सम्पर्क में नहीं आई वो उसका अब मिलना मुश्किल है। पूरे केस में महत्वपूर्ण फैक्ट ये भी था कि गांव वालों ने तालाब में मगरमच्छ को कभी देखा नहीं। ना ही संतोषी की बॉडी मिली थी।

पुलिस ने इतिहास खंगाला
इसलिए डीएसपी आशीष पटेल की टीम ने संतोषी के परिजनों के अलावा ग्रामीणों से रेण्डमली बयान लेने शुरू किए और कड़ी से कड़ी जोड़ी। झाबुओ से गुजरने वाली ट्रेनों में इस समुदाय के सफर का भी इतिहास खंगाला।

पहले परिजन भोपाल में करते थे मजदूरी
परिजनों से बातचीत में पता चला कि वो पहले भोपाल में मजदूरी किया करते थे। इसी आधार पर पूर्व के जांच अधिकारी भी भोपाल आकर जांच करके गए थे, मगर डीएसपी व उनकी टीम ने एक बार फिर भोपाल में संभावित जगहों पर तलाश करने की ठानी।

तलाश का दायरा बढ़ाया
डीएसपी आशीष पटेल कहते हैं कि पूर्व के जांच अधिकारियों की तरह हम खाली हाथ नहीं लौटना चाहते थे। इसलिए हमने संतोषी को ढूंढ़ने के लिए भोपाल में कुछ नई जगहों का भी शामिल किया। यानी तलाश का दायरा बढ़ाया।

आदिवासी समुदाय जैसे कपड़ों से लगा सुराग
डीएसपी पटेल व उनकी टीम संतोषी की तलाश करते हुए भोपाल की लालघाटी क्षेत्र पहुंची। वहां पर एक जगह आदिवासी समुदाय जैसे कपड़े देख खोजबीन शुरू की। उसी आधार पर संतोषी के मिलने की उम्मीद जगी।

बैंककर्मी बनकर पहुंचे संतोषी के घर
इसके बाद डीएसपी पटेल की टीम ने बेहद सावधानी से काम लिया। ये सादावर्दी में बैंककर्मी बनकर उस घर में गए। उनसे कहा कि वे बैंक से आए हैं और संतोष मोरी के नाम से कुछ पैसे देने आए हैं। इसलिए पहचान के दस्तावेज उपलब्ध करवाने होंगे।

संतोषी ने बताई पूरी कहानी
डीएसपी आशीष पटेल की यह ट्रिक काम कर गई और पैसे के लालच में संतोषी ने अपनी पहचान करवाई। फिर पुलिस ने उसे पूरी कहानी बताई और संतोषी की कहानी जानकार तो पुलिस दंग ही रह गई।

ट्रेन में सवार होकर भोपाल पहुंची थी संतोषी
पुलिस पूछताछ में संतोषी ने बताया कि वह ट्रेन में सवार होकर भोपाल पहुंची थी। यहां मजदूरी करने लगी। इसी दौरान भोपाल के ही एक युवक से उसने शादी कर ली। दोनों अपना घर बसाकर जीवन गुजार रहे थे।

परिजनों की आंखों से बहे खुशी के आंसू
भोपाल की लालघाटी क्षेत्र से संतोषी को दस्तयाब करके पुलिस झाबुआ लेकर आई और उसे परिजनों को सौंप दिया। दस साल से लापता बेटी को देख परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उनकी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।

कौन हैं डीएसपी आशीष पटेल?
बता दें कि आशीष पटेल मूलरूप से देवास जिले के गांव पिपलिया सड़क के रहने वाले हैं। 2016 बैच के डीएसपी हैं। झाबुआ महिला सुरक्षा डीएसपी पद पर इनकी पहली पोस्टिंग है। डीएसपी आशीष पटेल की शादी 21 नवंबर 2021 को डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा से हुई हैं। प्रिया वर्मा इंदौर के मांगलिया की रहने वाली हैं।












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