MP News: छिंदवाड़ा में सात मासूमों की मौत, कफ सिरप पर बैन, लेकिन मंत्री ने दी क्लीन चिट– क्या छिपा है असली राज
कल्पना कीजिए, एक छोटा-सा कस्बा जहां सर्दी-खांसी की साधारण बीमारी पर मांएं अपने बच्चों को घरेलू नुस्खों के साथ कफ सिरप पिला रही हैं। लेकिन अगले ही दिन अस्पताल की चीखें और शवों का सिलसिला...। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से निकली यह दर्दनाक दास्तान ने न सिर्फ पूरे राज्य को सिहरा दिया है, बल्कि देशभर के माता-पिता के दिलों में डर का सैलाब ला दिया है।
महज 15 दिनों में छह से सात मासूम बच्चे किडनी फेलियर से मारे गए, और संदेह की सूई दो कफ सिरप - कोल्डरिफ (Coldrif) और नेक्स्ट्रो-डीएस (Nextro-DS) - पर अटक गई। जिला प्रशासन ने तुरंत इनकी बिक्री और इस्तेमाल पर बैन ठोक दिया, लेकिन प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री (उपमुख्यमंत्री) राजेंद्र शुक्ला ने इन्हें क्लीन चिट दे दी। उनका कहना है, "मौत का कारण ये सिरप नहीं हैं।"

यह सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि राजनीति, प्रशासन और विज्ञान के बीच उलझा हुआ रहस्य है। आईसीएमआर (Indian Council of Medical Research) की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन तब तक क्या? क्या ये सिरप वाकई जहरीले हैं, या मौत की वजह कुछ और है? हमारी इस विस्तृत रिपोर्ट में हम पूरे मामले को कुरेदते हुए, घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ते हैं, माता-पिता की पीड़ा सुनाते हैं, और उन सवालों का जवाब तलाशते हैं जो आज पूरे मध्य प्रदेश को कचोट रहे हैं।
सर्दी से मौत तक का सफर
सब कुछ शुरू हुआ सितंबर के आखिर में। छिंदवाड़ा जिले के ग्रामीण इलाकों - जैसे चोपना, हर्रई और तामिया - में बच्चों में सर्दी-खांसी के लक्षण दिखने लगे। माता-पिता, जो ज्यादातर गरीब किसान या मजदूर परिवारों से हैं, ने स्थानीय दवा दुकानों से सस्ते कफ सिरप खरीदे। कोल्डरिफ और नेक्स्ट्रो-डीएस - ये दो दवाएं बाजार में आसानी से उपलब्ध थीं, और डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन के बिना भी बिक रही थीं।
पहली मौत 15 सितंबर को हुई। एक साल की मासूम नेहा (बदला हुआ नाम) को सिरप पिलाने के दो दिन बाद किडनी फेल हो गई। उसके बाद सिलसिला शुरू: 18 सितंबर को तीन साल का राहुल, 22 को पांच साल की प्रिया, 25 को दो साल का अजय, 28 को चार साल का सोहन, और 30 सितंबर को सात साल का विक्की। कुल छह मौतें - सभी 1 से 7 साल के बच्चे। डॉक्टरों की प्रारंभिक रिपोर्ट में किडनी फेलियर ही मौत का कारण बताया गया। बच्चे पहले ठीक लगते, फिर अचानक उल्टी, दस्त, कमजोरी और किडनी बंद हो जाती।
एक मां, राधा बाई (नाम गोपनीय), ने हमें फोन पर रोते हुए बताया, "डॉक्टर ने सिरप दिया था। बच्चा हंस रहा था, लेकिन रात में सांस लेना बंद। हम गरीब हैं, क्या करें? अब तो डर लगता है दवा देने से।" छिंदवाड़ा के सिविल अस्पताल में भर्ती एक बच्चे के पिता ने कहा, "हमने सोचा सर्दी है, लेकिन ये सिरप ने जिंदगी छीन ली।" स्थानीय लोग अब इन सिरपों को 'मौत का जहर' कह रहे हैं।
बैन का फैसला और जांच की शुरुआत
जैसे ही मौतों का सिलसिला बढ़ा, छिंदवाड़ा कलेक्टर ने 1 अक्टूबर को आपात बैठक बुलाई। जिला स्वास्थ्य टीम ने सिरप के सैंपल कलेक्ट किए और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। आदेश स्पष्ट था: "इन दवाओं का इस्तेमाल तुरंत बंद, दुकानों पर छापेमारी।" अब तक 50 से अधिक दुकानों से सैंपल लिए गए हैं।
राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की टीम भी 30 सितंबर को छिंदवाड़ा पहुंची। उन्होंने अस्पतालों, दुकानों और मृत बच्चों के घरों से सैंपल जमा किए। आईसीएमआर की रिपोर्ट का इंतजार है, जो 7-10 दिनों में आ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सिरप में एथिलीन ग्लाइकॉल (एक जहरीला तत्व) जैसा कुछ मिला, तो ये 2018 के गड्ढा घाटी कांड की याद दिलाएगा, जहां 100 से अधिक बच्चे सिरप से मारे गए थे।
लेकिन राजस्थान में भी अलार्म बजा। सीकर जिले में दो बच्चों की मौत के बाद वहां भी इन सिरपों पर जांच शुरू हो गई। मध्य प्रदेश सरकार ने सतर्कता बरतते हुए पूरे राज्य में सैंपलिंग अभियान चला दिया।
मंत्री का बयान: क्लीन चिट या कवर-अप?
अब आता है विवाद का केंद्र। 1 अक्टूबर को रीवा में मीडिया से रूबरू होते हुए स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने कहा, "सरकार पूरी स्थिति पर नजर रखे हुए है। प्रारंभिक जांच में सिरप में कोई मिलावट नहीं पाई गई। बच्चों की मौत का कारण ये सिरप नहीं है। हम आईसीएमआर की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा, "ये मौतें सिरप से नहीं, बल्कि मौसमी बीमारी या अन्य कारणों से हुईं।"
यह बयान आते ही राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया। कांग्रेस ने इसे 'कवर-अप' करार दिया। भोपाल में कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने कहा, "मंत्री का बयान शर्मनाक है। कंपनी को बचाने के लिए जांच का इंतजार? ये तो साफ है कि सरकार दवा कंपनियों के साथ खड़ी है।" विपक्ष के आरोप हैं कि भाजपा सरकार दवा उद्योग को संरक्षण दे रही है, जबकि जिला प्रशासन का बैन 'जल्दबाजी' है।
मंत्री शुक्ला ने बचाव में कहा, "हम पारदर्शी जांच चाहते हैं। एनसीडीसी की टीम सक्रिय है।" लेकिन सवाल यह है: अगर सिरप निर्दोष हैं, तो बैन क्यों? और अगर मौत का कारण कुछ और है, तो किडनी फेलियर का पैटर्न इतना एकसमान क्यों?
राजनीतिक रंग: स्वास्थ्य बनाम वोटबैंक
यह मामला अब सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, राजनीति का हो गया है। छिंदवाड़ा कमलनाथ का गढ़ रहा है, और यह घटना आगामी चुनावों से पहले सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर रही है। कांग्रेस ने विधानसभा में विशेष सत्र की मांग की, जबकि भाजपा ने 'तथ्यों पर आधारित' जांच का हवाला दिया।
एक वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "कफ सिरप में डायथाइलीन ग्लाइकॉल जैसी मिलावट आम समस्या है। 2023 में उत्तर प्रदेश में भी ऐसा हुआ था। मंत्री का जल्दबाजी में क्लीन चिट देना गलत है।" जनता की प्रतिक्रिया भी तीखी है।
असली सवाल: मौत का रहस्य कब सुलझेगा?
- क्या बैन सही था? हां, क्योंकि इससे आगे की मौतें रुक सकती हैं। लेकिन अगर सिरप निर्दोष साबित हुए, तो दवा कंपनियों को नुकसान।
- मौत का असली कारण? किडनी फेलियर का पैटर्न सिरप की ओर इशारा करता है, लेकिन वायरल इंफेक्शन या पानी की समस्या भी हो सकती है। आईसीएमआर रिपोर्ट ही फैसला करेगी।
- प्रशासन की नाकामी? ग्रामीण इलाकों में दवाओं की बिना जांच बिक्री एक बड़ी समस्या। सरकार को सख्त लाइसेंसिंग की जरूरत।
30 सितंबर को जारी प्रशासनिक तबादलों के बीच (समाज कल्याण विभाग के आदेश क्रमांक ई-1/142/2025/5/क), स्वास्थ्य विभाग में भी फेरबदल की चर्चा है। क्या ये बदलाव जांच को प्रभावित करेंगे?
मासूमों की चीखें अनसुनी न हों
छिंदवाड़ा की इन मौतों ने मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोल दी है। सात परिवारों का दर्द, हजारों माता-पिताओं का डर - ये सिर्फ आंकड़े नहीं, इंसानी कहानियां हैं। सरकार से अपील है: पारदर्शिता बरतें, रिपोर्ट जल्द जारी करें। और माता-पिता से: दवाएं डॉक्टर की सलाह से ही दें।












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