किन्नर को दिल दे बैठा 24 साल का युवक, I LOVE YOU बोलकर रचा ली शादी
आजमगढ़ जिले के महाराजगंज ब्लॉक स्थित भैरव धाम परिसर में एक किन्नर और एक लड़के का प्रेम परवान चढ़ा और वे दोनों भैरव बाबा को साक्षी मानकर एक दूजे के होते हुए परिणय सूत्र में बंध गए।

किसी कवि ने कहा है कि "प्रेम को ढाई अक्षर का कैसे कहे, प्रेम सागर से गहरा है नभ से बड़ा। प्रेम होता है दीखता नहीं है मगर प्रेम कीही धुरी पर येजग है खड़ा।" प्रेम की व्याख्या हर युग के रचनाकार,साहित्यकार ऋषि मुनि सहित चिंतकों ने अनेक प्रकार से किया है परन्तु इसका भाव वही समझ सकता है जो इसमें निश्छल भाव से गोता लगाया हो फिर भी शब्दों के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ति उसके लिए भी संभव नहीं होता, यह कहना तब और उपयुक्त हो जाता है ज़ब यह चरितार्थ होता दिखे। प्रेम का ऐसा मामला आजमगढ़ जिले के महाराजगंज ब्लॉक स्थित भैरव धाम परिसर में उस वक्त चरितार्थ होता नजर आया जहां एक किन्नर और एक लड़के का प्रेम परवान चढ़ा और वे दोनों भैरव बाबा को साक्षी मानकर एक दूजे के होते हुए परिणय सूत्र में बंध गए।

परिणय सूत्र में बंधे वीरू और मुस्कान (किन्नर)
बता दें कि जलपाईगुड़ी, वेस्ट बंगाल के निवासी मुस्कान नाम की किन्नर विगत 2 साल पूर्व मऊ जिले में एक नृत्य कार्यक्रम के लिए आई थी। जहां उसकी मुलाकात मऊ के थाना मोहम्मदाबाद में देवसीपुर पोस्ट टेकई के रहने वाले वीरू राजभर से हुई। पहली मुलाकात में ही दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे। पिछले लगभग डेढ़ साल से वीरू और मुस्कान वीरू के घर ही रहने लगे। इस बीच दोनों का प्यार और भी प्रगाढ़ हुआ और मन ही मन दोनों एक दूसरे का हमसफर बनने को राजी हो गए। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि वीरू और मुस्कान के इस संबंध से उसके परिवार को भी कोई आपत्ति नहीं है। वही परिवार के आशीर्वाद और सहमति से आज दोनों ने भैरव बाबा को साक्षी मानकर उनके समक्ष एक दूसरे का दामन थाम लिया और परिणय सूत्र में बंध गए।

भारतीय समाज में किन्नरों की स्वीकार्यता
भारत में किन्नरों को सामाजिक तौर पर बहिष्कृत ही कर दिया जाता है। उन्हें समाज से अलग-थलग कर दिया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्हें न तो पुरुषों में रखा जा सकता है और न ही महिलाओं में, जो लैंगिक आधार पर विभाजन की पुरातन व्यवस्था का अंग है। यह भी उनके सामाजिक बहिष्कार और उनके साथ होने वाले भेदभाव का प्रमुख कारण है। इसका नतीजा यह है कि वे शिक्षा हासिल नहीं कर पाते। बेरोजगार ही रहते हैं। भीख मांगने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं रहता। सामान्य लोगों के लिए उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का लाभ तक नहीं उठा पाते।
इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 19 जुलाई 2016 को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल 2016 को मंजूरी दी थी। भारत सरकार की कोशिश इस बिल के जरिए एक व्यवस्था लागू करने की थी, जिससे किन्नरों को भी सामाजिक जीवन, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में आजादी से जीने के अधिकार मिल सके। आज हुई इस शादी से यह तो कहा जा सकता है कि लंबे समय से सरकार द्वारा किन्नरों को मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश सफल होती नजर आ रही है।

किन्नर भारतीय इतिहास का अभिन्न हिस्सा
भारतीय पौराणिक कथाओं, मिथक , रामायण, महाभारत आदि में किन्नरों का जिक्र आता रहा है। महाभारत में शकुनि की कथा को कौन नहीं जानता? यहाँ तक की अर्जुन के बारे में भी ये सर्वविदित है कि एक अप्सरा के श्राप के कारण उन्हें कुछ समय के अपना पौरुषत्व खोना पड़ा था। मध्यकालीन इतिहास में भी किन्नरों जिक्र बार बार आता है। खासकर मुगलकालीन इतिहास में इस बात का जिक्र आता है कि किन्नरों का इस्तेमाल मुग़ल बादशाहों के बेगमों की सेवा में किया जाता था।
परंतु जहां तक किन्नरों के बराबर अधिकार की बात है, इतिहास में ऐसा कोई जिक्र नहीं आता है। स्वतंत्रता हासिल करने के बाद भी किन्नरों के दशा और दिशा में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। अभी हाल के कुछ पिछले दशकों की बात है कि यदि कोई किन्नर शिशु किसी परिवार में पैदा होता था तो उसके परिवार वाले चाहकर भी अपने घर में नहीं रख पाते थे।

बदलनी होगी सोच
यह सर्वविदित तथ्य है कि सिनेमा समाज का प्रतिबिंब होता है। सिनेमा दर्शाता है कि समाज में क्या हो रहा है। भारतीय संदर्भ में भी यही सच है। यदि कोई भारतीय सिनेमा में किन्नरों की भूमिका का अवलोकन करता है, तो उनकी भूमिका प्रमुख रूप से नर्तक, भिखारी और सेक्स वर्कर के रूप में कार्य करने तक सीमित होती है।
भारतीय फिल्म जैसे "सड़क", "अमर, अकबर एंथनी" आदि में किन्नरों के चित्रण को कौन भूल सकता है। भारतीय सिनेमा में भी किन्नरों की भूमिका नकारात्मक चरित्रों के चित्रण की सीमा तक सीमित है , जो कि भारतीय समाज में उनकी बिगड़ती हुई स्थिति पर प्रकाश डालते हैं।
हालाँकि पिछले कुछ सालों में माननीय भारतीय न्यायालयों द्वारा कुछ ऐसे फैसले आएं हैं जिनसे इनकी सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ी है। परंतु इसका श्रेय कुछ समाज सेवी संस्थाओं को जाता है जिन्होंने किन्नरों के हित मे लड़ाई की।












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