विकलांग अफ़ताब नहीं, बल्कि व्यवस्था है!

Handicapped BTech student fails to win war against system
इलाहाबाद। कहते हैं ना कि माजिलें हैं तो मुश्किलें हैं और मुश्किलें हैं तो रास्ते हैं। कुछ ऐसे ही जज्बे के साथ मुजफ्फरपुर का अफताब आलम आगे बढ़ा था। ऊपरवाले ने उसे हाथ नहीं दिए तो क्या आगे बढ़ने के लिए दो पैर और हिम्मत जरूर दी। अफताब शारीरिक विकलांगता से तो जीत गया, लेकिन लकीर के फ़कीर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के नियम-कानूनों से वो हार गया।

अफताब के जन्म से दोनों हाथ नहीं हैं। उसने पैरों से लिख लिखकर अपनी प्रतिभा के बल पर इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा को पास किया। उसने यहां इलेक्ट्रॉनिकस इंजीनियरिंग में दाखिला लेकर अपनी काबिलियत तो दर्ज करा दी, लेकिन विभाग के दकियानूसी नियमों के आगे वो हार गया और उसे टूटे सपनों के साथ ही बिहार लौटने को मजबूर होना पड़ा है। अपाहिज बच्चे को इंजीनियर बनाने का सपना दिखाने वाले उसके माता-पिता बिहार में एक ईँट भट्टे पर काम क़रके परिवार पालते हैं। वो परिवार हालात से तो जीत गया लेकिन एक बार फिर सरकारी सिस्टम से नहीं।

ईस्ट के ऑक्सफ़ोर्ड कहे जाने इलाहाबद विश्व विद्यालय में दाखिला लेना हर काबिल छात्र का सपना होता है लेकिन यहा के इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेंट में दाखिला लेना देश की बेस्ट आई आई टी में दाखिला लेने जैसा ही होता है। आफ़ताब आलम ने भी यही ख़्वाब देखा था। उसने यूपी-एआईआईआई जैसी देश की मुश्किल इंजीयनियरिंग परीक्षा के एंट्रेंस में कामयाबी हासिल करने के बाद यहां एडमीशन लेकर पढ़ाई शुरू की। एक सेमेस्टर भी पास कर लिया लेकिन अफसोस वह सारी परीक्षाएं पास करने के बाद भी इंजीनियर नहीं बन पायेगा। क्‍योंकि लिखत परीक्षा में तो उसे हेल्पर दिया जाता है, लेकिन प्रैक्टिकल में नहीं। क्‍योंकि ऐसा कोई नियम ही नहीं बना। आफताब ने विश्‍वविद्यालय के वीसी से लेकर चांसलर तक अपनी एप्‍लीकेशन भेजी लेकिन उसकी सुनवाई कहीं नहीं हुई। हर जगह उसे न मिली। हार कर अफताब को अब इस विश्वविद्यालय को छोड्कर वापस घर जाने का फैसला करना पड़ा है।

विश्‍वद्यिालय के डीन का कहना है कि आफताब का प्रवेश विकालांग कोटे में हुआ था और चूंकि ऐसा कोई नियम नहीं है, लिहाजा वो कुछ नहीं कर सकते। उन्‍होंने कहा कि जब आफताब पढ़ने आया था, तभी हमने उससे कहा था कि देख लो, तुम प्रेक्टिकल कर पाओगे या नहीं। अब इस मामले में विश्‍वविद्यालय कुछ नहीं कर सकता है। आफताब के जीवन की इस घटना से यह साफ है कि देश के ऐसे विकलांग जिनके दोनों हाथ नहीं हैं, उनके लिये इंजीनियर बनने का सपना देखना भी गुनाह है, क्‍योंकि ऐसा सपना आगे चलकर उनका साल बर्बाद कर सकता है।

आफतब के पैदा होते ही दफ्न करने की दी थी सलाह

आफताब की अम्मी आसमा ने जितनी मेहनत और सामाजिक दुश्वारियों के साथ अपने इस काबिल बेटे को पढ़ा कर यहाँ तक पहुंचाया। उसी बेटे को वापस अपने घर ले जाते वक्त उनका उनका कलेजा बैठा जा रहा है। नम आँखों से अपने काबिल बेटे को सांत्वना देने की कोशिश कर रहे इस दम्पत्ति को बार बार आफताब के जन्म के समय की वो बाते जेहन में दौड जाती है जब आफ़ताब के जन्म के बाद उनके परिवार-मुहल्ले के लोगो ने आफ़ताब के दोनों हाथ न होने पर उसी समय दफ़न कर देने की अमानवीय सलाह दी थी।

आफताब के आपाहिज होने के उस अहसास पर माँ की ममता भारी पड़ गई और वह उससे उन्होंने खुद को उबार भी लिया लेकिन एक बार सरकारी प्रशासनिक तंत्र के सामने वह टूट गए उनके सपने बिखर गए।

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