जर्मनी: ‘बदलाव’ के सहारे बाढ़ में तबाह हो चुके ‘स्वर्ग’ को फिर से बसाने की तैयारी

नई दिल्ली, 19 नवंबर। अल्फ्रेड सेबेस्टियन उस जगह का मुआयना कर रहे हैं जहां उनकी रसोई हुआ करती थी. अब यहां फर्श का नामोनिशान नहीं है. दीवार भी टूटी हुई हैं. सिर्फ हार्डवेयर टूल और कुछ दूसरे मशीन दिख रही हैं. यह जगह पश्चिमी जर्मनी की आहर घाटी स्थित डेरनाऊ गांव में है. पहले यह गांव जर्मनी के अन्य विकसित गांवों की तरह ही था, लेकिन जुलाई महीने में आयी विनाशकारी बाढ़ ने सब कुछ बर्बाद कर दिया. पूरी तस्वीर ही बदल गई.
सेबेस्टियन कहते हैं, "यह सब इतनी जल्दी हुआ कि हमें अपने सामानों को सुरक्षित जगह पर पहुंचाने का मौका भी नहीं मिला. हमें उम्मीद ही नहीं थी कि अचानक इतना ज्यादा पानी आ जाएगा."
आहर घाटी अंगूर के बागों के लिए जाना जाता है. यहां बहने वाली आहर नदी में आमतौर पर ज्यादा पानी नहीं होता है, लेकिन जुलाई महीने में भारी बारिश की वजह से नदी ने रौंद्ररूप धारण कर लिया और यह क्षेत्र पूरी तरह तबाह हो गया. किसी के पास कोई मौका नहीं था कि वह कुछ बचा सके.
सेबस्टियान डेरनाऊ के मेयर हैं. बाढ़ के बाद उनका बेसमेंट और नीचे वाला फ्लोर पानी और कीचड़ से भर गया था. उन्हें मजबूरन ऊपरी फ्लोर पर शिफ्ट करना पड़ा. चूंकि उनका घर पहाड़ी से थोड़ा आगे था, इसलिए ज्यादा नुकसान नहीं हुआ.
बाढ़ की वजह से इस घाटी में 130 से ज्यादा लोगों की मौत हुई. 17,000 से ज्यादा घर टूट गए या वहां रखा सामान बह गया. सेबेस्टियान के अनुसार, डेरनाऊ में ही शहर के 500 में से 400 घर वीरान पड़े हैं. यहां के निवासी इस सवाल से जूझ रहे हैं कि क्या दूसरी जगह पलायन करना है या बाढ़ के संभावित खतरों के साथ यहीं रहना है?
सेबेस्टियान कहते हैं, "कई लोगों ने बारिश के डर की वजह से अपना घर पहले ही बेच दिया. वह अचानक आने वाली बाढ़ के डर के साये में नहीं जीना चाहते हैं. हालांकि, मेरे विचार ऐसे नहीं हैं. इसके बावजूद, मुझे भी हमेशा बाढ़ आने का डर लगा रहता है."
बाढ़ के मैदान में पुनर्निर्माण
सरकार ने बाढ़ प्रभावित लोगों की सहायता के लिए 30 बिलियन यूरो का फंड जारी किया है. अधिकारियों ने आहर नदी घाटी के नए बाढ़ क्षेत्र के नक्शे भी प्रकाशित किए हैं. इनमें दिखाया गया है कि अब किस जगह पर नए निर्माण की अनुमति नहीं है. स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि क्षतिग्रस्त हुए हजारों घरों में से सिर्फ 34 को फिर से बनाने की अनुमति नहीं दी गई है.
बाढ़ के मैदान के अधिकांश निवासियों को उसी स्थान पर पहले की तरह अपने घरों का मरम्मत करने और पुनर्निर्माण की अनुमति होगी. हालांकि, कई मशीनों के इस्तेमाल पर पाबंदी रहेगी. बाढ़ के मद्देनजर अभी पूरी जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन नियामक प्राधिकरण का कहना है कि इसमें ऊपरी मंजिलों पर फ्यूज बॉक्स स्थापित करने जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं. इससे बाढ़ आने पर बिजली की आपूर्ति बाधित नहीं होगी.
सेबेस्टियान का कहना है कि यह अभी तक साफ नहीं हुआ है कि बीमा कंपनियां बाढ़ के मैदान में पुनर्निर्माण करने वाले निवासियों के लिए प्राकृतिक आपदाओं में कवरेज उपलब्ध कराएगी या नहीं.
पलायन या डर के साये में जिंदगी?
लाइपजिग के हेल्महोल्त्स सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल रिसर्च में पर्यावरणीय खतरों और चरम घटनाओं के विशेषज्ञ प्रोफेसर क्रिस्टियान कुहलिके कहते हैं कि लोगों को आहर घाटी जैसे जलग्रहण क्षेत्रों में निर्माण करने के तरीके में 'मौलिक परिवर्तन' करने की जरूरत है. यहां रहना असुरक्षित होता है. अक्सर बाढ़ का खतरा बना रहता है. अगर 'मौलिक परिवर्तन' नहीं किया जाएगा, तो यहां रहना और भी घातक हो सकता है.
कुहलिके कहते हैं कि ऊंचे इलाके पर जाकर बसना ही इस इलाके के लोगों के लिए बेहतर निर्णय हो सकता है. वह अमेरिकी शहर वाल्मेयर का हवाला देते हैं. यह शहर 1993 में एक विनाशकारी बाढ़ के बाद मिसिसिपी घाटी से पूरी तरह से नजदीक की पहाड़ियों में स्थानांतरित हो गया था.
वह कहते हैं, "अब यह सेंट लुइस की सीमाओं के करीब समृद्ध समुदाय है. अगर लोग बाढ़ के इलाके से निकलकर दूसरी जगह पर जाना चाहते हैं, तो उनकी सहायता करनी चाहिए." आहर घाटी के मामले में वे बाढ़ प्रतिरोधी इमारतों की जगह लोगों के दूसरी जगह पर बसने को ज्यादा तवज्जो देते हैं.
वे कहते हैं कि अगर इलाके में पुनर्निर्माण कैसे करना है या लोगों को दूसरी जगह पर कैसे स्थानांतरित करना है, इसके बारे में फैसला लेने का अधिकार निवासियों पर छोड़ दिया जाता है, तो यह राजनीतिक संकेत है. इसका मतलब है कि हम निवासियों को घाटी में रखना चाहते हैं.
बाढ़ प्रतिरोधी घर
कुहलिके जोर देकर कहते हैं कि जुलाई की बाढ़ को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता था, क्योंकि काफी ज्यादा बारिश हुई. हालांकि, कुछ तरीके हैं जिनसे बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है.
उदाहरण के लिए, बाढ़ के पानी को घर में घुसने से रोकने के लिए मजबूत दरवाजे और खिड़कियों का इस्तेमाल करना, बाढ़ के पानी को घर में जाने देने के लिए वेट फ्लडप्रूफिंग का इस्तेमाल करना, पानी से खराब न होने वाले भवन निर्माण सामग्री का इस्तेमाल करना वगैरह.
पुनर्निर्माण के दौरान CO2 के उत्सर्जन का भी ध्यान रखना चाहिए, ताकि जलवायु पर नकारात्मक असर न पड़े. वह कहते हैं, "कोई सिर्फ इस बात की उम्मीद कर सकता है कि उनके पास वाकई में कुछ ऐसे इंजीनियर और आर्किटेक्ट हैं जो लोगों को टिकाऊ निर्माण में मदद कर सकें."
अब सिर्फ घरों में बदलाव की जरूरत नहीं है. सेबेस्टियान का कहना है कि भविष्य की किसी भी बाढ़ के प्रभाव को कम करने के लिए, इलाके में और नदी के किनारे ज्यादा पानी के भंडारण पर भी काम करना होगा. इसमें रिटेंशन बेसिन अपस्ट्रीम शामिल है.
अलग तरह से पुनर्निर्माण का मौका
सेबेस्टियान शहर के पुनर्निर्माण को बदलाव के एक मौके की तरह देखते हैं. शोधकर्ताओं के एक समूह ने प्रस्ताव रखा है कि किस तरह से यह इलाका 2027 तक अक्षय ऊर्जा से अपनी ऊर्जा आपूर्ति का 100% उत्पन्न कर सकता है. उदाहरण के लिए, पवन उर्जा का इस्तेमाल करना, छतों पर सौर उर्जा का पैनल लगाना वगैरह.
उनका कहना है कि बाढ़ से सबक यह मिली है कि भविष्य में डेरनाऊ की घरों को जीवाश्म ईंधन से गर्म नहीं किया जाएगा. वर्तमान में जर्मनी में लगभग एक चौथाई घरों को जीवाश्म ईंधन से ही गर्म किया जाता है.
बाढ़ की वजह से कई हीटिंग सिस्टम लीक हो गए और घरों को दूषित कर दिया. उनमें मौजूद ईंधन क्षति और पुनर्निर्माण की लागत को बढ़ा रहे हैं. अब सेबेस्टियान नवीकरणीय उर्जा से संचालित होने वाला आधुनिक हीटिंग नेटवर्क बनाना चाहते हैं.
वह कहते हैं, "इसके लिए हमें काफी मदद चाहिए होगी. अगर आहर घाटी को नवीकरणीय उर्जा का इस्तेमाल करने वाला मॉडल इलाका बनाना है, तो हमें ज्यादा पैसे चाहिए होंगे और वह भी तुरंत. ऐसा नहीं होने पर, लोग पुराने तरीके का इस्तेमाल शुरू करने लगेंगे."
संतुलन जरूरी
उम्मीद जताई गई है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से भविष्य में पूरी दुनिया में चरम मौसम की घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी. ऐसे में लचीले घरों का निर्माण करना जरूरी होगा, क्योंकि हमें उर्जा के नवीकरणीय स्रोतों पर स्विच करना होगा. हालांकि, इन सब के बीच पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के बारे में क्या?
निर्माण क्षेत्र में कंक्रीट और स्टील जैसी सामग्री का काफी ज्यादा इस्तेमाल होता है. वर्ष 2019 में वैश्विक ऊर्जा से संबंधित उत्सर्जन का करीब 40% हिस्सा निर्माण क्षेत्र से हुआ था.
बिल्ड चेंज एक एनजीओ है जो तूफान, बाढ़, भूकंप जैसी जोखिमों का सामना करने वाले लोगों के लिए ऐसे घर बनाता है जिनमें आपदा के दौरान कम से कम नुकसान हो. इसकी सीईओ एलिजाबेथ हॉसलर कहती हैं, "बिल्कुल, संतुलन बनाना काफी जरूरी है. निर्माण से जुड़ी सामग्री के विकल्पों पर विचार होना चाहिए."
वह कहती हैं, "उदाहरण के लिए, तूफान संभावित इलाकों में मजबूत कंक्रीट ब्लॉकों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए." कंक्रीट को विश्वसनीय और जलवायु के अनुरूप सामग्री के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसे तैयार करने के लिए सीमेंट की जरूरत होती है. सीमेंट अकेले वैश्विक स्तर पर 8% CO2 के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है.
हॉसलर ने जोर देकर कहा कि हमारी पहली प्राथमिकता ये होनी चाहिए कि घर अपनी जगह से पूरी तरह अलग न हो जाएं, ताकि पुनर्निर्माण के दौरान कार्बन का ज्यादा उत्सर्जन न हो.
डेरनाऊ गांव की गलियां अभी पूरी तरह वीरान हैं. कई इमारतों के ऊपरी हिस्से पर भूरे रंग की लकीर बता रही है कि बाढ़ के दौरान कितनी ऊंचाई तक नदी का जल स्तर बढ़ गया था. मेयर अल्फ्रेड सेबेस्टियान को उम्मीद है कि 2,000 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 90 प्रतिशत लोग वापस आ जाएंगे और फिर से अपने घरों को संवारेंगे.
वह कहते हैं, "यह गांव कभी स्वर्ग हुआ करता था. बाढ़ के बाद अब रेगिस्तान की तरह हो गया है. हमें उम्मीद है कि अगले 10 साल में हम फिर से इसे स्वर्ग बना देंगे और हमें फिर से ऐसी विनाशकारी बाढ़ का सामना नहीं करना पड़ेगा. हालांकि, कोई इसकी गारंटी नहीं दे सकता."
रिपोर्टः नैटली आलिक्स म्युलर
Source: DW












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