रियल लाइफ 'खुदा गवाह' का गवाह बना था प्रथम विश्‍व युद्ध

तू न जा मेरे बादशाह, एक वादे के लिये एक वादा तोड़ कर, मैं वापस आउंगा, जा रहा हूं मैं यहां जान अपनी छोड़ कर.... यह गीत और अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म खुदा गवाह आपने जरूर देखी होगी। फिल्‍म में बादशाह खान को अफ्गानिस्‍तान की बेनज़ीर (श्रीदेवी) से प्रेम हो जाता है, लेकिन उससे शादी करने के लिये उसे भारत की जेल में बंद हबीबुल्‍लाह नाम के एक कैदी का सिर कलम करना होता है।

वह हबीबुल्‍लाह को मार देता है, तो भारतीय पुलिस उसे पकड़कर जेल में बंद कर देती है। जेल में बंद बादशाह खान जेलर रनवीर सिंह सेठी से अपने वतन जाने का प्रस्‍ताव रखता है, इस वादे के साथ कि वह एक महीने में वापस लौट आयेगा। जेलर उसे जाने देता है, बादशाह खान वतन जाकर बेनजीर से शादी करता है और ठीक एक महीने बाद जेलर को किया हुआ वादा निभाने के लिये अपना वतन छोड़कर जेल वापस आ जाता है।

यह तो रील लाइफ थी, लेकिन अगर रीयल लाइफ पर नजर डालें, तो इतिहास के पन्‍नों में ऐसी ही एक कहानी दर्ज हुई है, जो प्रथम विश्‍व युद्ध के समय की है। वहां पर जर्मनी ने ब्रिटेन के एक सैन्‍य अधिकारी कैप्‍टन रॉबर्ट कैम्‍पबेल को बंदी बना लिया और जेल में डाल दिया। यह खबर उसके घर पहुंची, तो उसकी मां सदमें में चली गई। मां लुइस कैम्‍पबेल बीमार रहने लगी और अंतिम सांसें गिनने लगीं, तभी एक चिठ्ठी जर्मनी की मगडीबर्ग जेल पहुंची, जिसमें लिखा था कि 29 वर्षीय रॉबर्ट की मां कैंसर से ग्रसित है और बहुत ज्‍यादा बीमार है।

मगडीबर्ग जेल को उस समय वॉर कैम्‍प में तब्‍दील किया जा चुका था। वहां के इंचार्ज केसर विलहेल्‍म द्वितीय थे। रॉबर्ट ने उन्‍हें चिठ्ठी लिखी और उनसे घर जाने की बिनती की और बादशाह खान की तरह उसने भी वादा किया कि वह मां को देखने के बाद वापस लौट आयेगा। विलहेल्‍म ने उसे इजाजत देते हुए सिर्फ इतना कहा, "मैं सिर्फ तुम्‍हें इसलिये जाने दे रहा हूं, क्‍योंकि तुम एक आर्मी ऑफीसर हो और आर्मी ऑफीसर की जुबान कभी खाली नहीं जानी चाहिये।"

Robert

दिसंबर 1916 में रॉबर्ट जुबान देकर जेल से निकला और कई शहर पार करके अपने घर पहुंचा। घर पहुंच कर उसने अपनी मां की खूब सेवा की, मां और घर वालों के प्रेम में बहने के बावजूद अपना वादा नहीं भूला और ठीक दो महीने बाद वह जर्मनी की जेल वापस लौट गया। 1918 में जब विश्‍व युद्ध खत्‍म हुआ तब जाकर कैप्‍टन रॉबर्ट कैम्‍पबल को रिहा किया गया। वहां से लौटने के बाद इस आर्मी ऑफीसर ने 1925 में सेना में वापसी की और 1939 में उसे रॉयल ऑबजर्वर कॉर्प्‍स का चीफ ऑबजर्वर बनाया गया। इस ईमानदार सैन्‍य अधिकारी की मौत 1966 में 81 साल की उम्र में हुई। और उनके बारे में इतनी महत्‍वपूर्ण जानकारी इतिहासकार रिचर्ड वैन एमडेन ने खोजी।

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