चीन के खिलाफ जासूसी करने में नेहरु ने की थी अमेरिका की मदद
नयी दिल्ली। स्वतंत्र राष्ट्रीय सुरक्षा अभिलेखागार ने अपनी एक रिपोर्ट में सनसनीखेज खुलासा किया है। एनएसए की रिपोर्ट के मुताबिक 1962 में चीन के साथ युद्ध में मिली हार के बाद भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने चीन की जासूसी में अमेरिका की मदद की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने ड्रैगन क्षेत्र को निशाना बनाने के लिए अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के यू-2 जासूसी विमानों को अपने एक हवाई अड्डे के इस्तेमाल की अनुमति दी थी ताकि वो चीन की जासूसी आसानी से कर सके।
प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 11 नवंबर 1962 को चीन के साथ लगे भारत के सीमावर्ती इलाकों में अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे यू-2 मिशन के विमानों को उड़ान की अनुमति दी थी। एनएसए ने यह रिपोर्ट सीआईए के फ्रीडम ऑफ इंफारमेशन एक्ट के तहत हाल ही में गोपनीय सूची से हटाए गए दस्तावेज के आधार पर तैयार की है।

इन दस्तावेजों के आदार पर तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के बीच 1963 में हुई बैठक के बाद ओडिशा के चरबतिया हवाई अड्डे के इस्तेमाल पर सहमति बनी थी। सहमति के बाद भारत इस हवाई अड्डे को तय समयसीमा में ठीक नहीं कर पाया था, जिसके बाद ्मेरि का को अपने मिशन के लिए थाईलैंड के ताखली हवाई अड्डे का इस्तेमाल करना पड़ा था।
सीआईए की रिपोर्ट के अनुसार, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने अक्तूबर 1962 को भारत के जम्मू और कश्मीर तथा नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी ने बड़े पैमाने पर अचंभित करने वाले हमले शुरू किए। चीन ने हमले रोकने से पहले ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तर स्थित भारत के सभी मोर्चों की किलेबंदी कर ली थी। चीन का हरकतों को देखने के बाद भारत सरकार ने अमेरिका से सैन्य मदद की गुहार लगाई थी।
इसी दौरान 11 नवंबर 1962 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने प्रस्तावित अभियान पर सहमति जताई और अमेरिका को उसके यू-2 विमानों को भारतीय हवाई अड्डे से ईंधन लेने की अनुमति दे दी। बाद में नेहरू के निधन की वजह से मई 1964 में चरबतिया में यू-2 विमान की पहली तैनाती को रद्द कर दिया गया।












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