बीमारियों का घर होती हैं बहुमंजिला इमारतें
लखनऊ। जमाना बहुमंजिली इमारतों का है। कस्बों से लेकर महानगरों तक, हर तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें नजर आती हैं। कम जगह में ढेर सारे आशियाने, करीने से सजे हुए, देखने में खूबसूरत और ढेर सारी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस, मगर चिकित्सकों की नजर में ये आशियाने 'बीमारियों के घर' हैं। भूतल से सैकड़ों फीट ऊंची इमारतों में रहने वाले लोग धूप और उचित प्रकाश की कमी के चलते 'साइकोसोमेटिक' व सांस संबंधी बीमारियों, खासकर अस्थमा की चपेट में आ जाते हैं।
चिकित्सक कहते हैं कि सूर्य की उष्मा में वह जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो शरीर को बीमारियों से बचाने में मददगार साबित होते हैं। अधिकांश बहुमंजिली इमारतों की बनावट कुछ इस प्रकार की होती है कि उसमें पर्याप्त धूप व रोशनी जाने के लिए जगह ही नहीं होती। वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के वक्षरोग विशेषज्ञ प्रो. एस.के. अग्रवाल कहते हैं कि हवा, पानी व धूप जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम रहने के चलते बहुंमजिली इमारतें स्वास्थ्य के लिहाज से उचित बसेरा साबित नहीं हो रही हैं।

वह कहते हैं, "जब शरीर पर सूर्य की रोशनी नहीं पड़ती है तो माइट नामक जीवाणु जो धूल के साथ पलता है, सांस के माध्यम से व्यक्ति के फेफड़े में पहुंचकर संक्रमण फैलाता है, जिसके चलते व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते हैं। माइट नामक इस जीवाणु को मारने के लिए सूर्य की उष्मा जरूरी है। जैसे ही घर में सूर्य की किरणें पड़ती हैं, जीवाणु मर जाते हैं।" प्रो.अग्रवाल ने कहा कि बहुमंजिली इमारतों के फ्लैट में रहने वाले बच्चे भी स्वस्थ नहीं रहते। बच्चों को खेलने के लिए इनडोर गेम के सिवा कुछ और नहीं होता। परिणामस्वरूप मोटापा, तनाव व अवसाद के चलते बच्चों का विकास बाधित हो जाता है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में संयुक्त परिवार की अपेक्षा एकल परिवार में रहने वाले लोग इन इमारतों में असुरक्षा की भावना के चलते अक्सर चिंताग्रस्त हो जाते हैं। इस तरह के परिवारों में साइकोसोमेटिक बीमारी, जिसमें तनाव व अवसाद की प्रमुखता होती है, देखी जा सकती है। प्रो.अग्रवाल बताते हैं कि बहुमंजिली इमारतों में पेड़-पौधों की कमी के चलते शुद्ध ऑक्सीजन की उपलब्धता भी किसी चुनौती से कम नहीं होती। ऐसे इलाकों में प्राय: ऑक्सीजन की मात्रा हरी-भरी जगहों की अपेक्षा बहुत कम होती है। जब शरीर को ऑक्सीजन की उचित मात्रा नहीं मिल पाती है तो उसके अंदर कई तरह की बीमारियां पनपने लगती हैं।
बढ़ती जनसंख्या के चलते आजकल बहुमंजिली इमारतों में रहना लोगों की मजबूरी भी है। प्रो. अग्रवाल का कहना है कि इमारतों को इस प्रकार डिजाइन किया जाना चाहिए जिससे सूर्य की रोशनी कमरों में जाए। इसके साथ ही वेंटीलेशन का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है। वह कहते हैं कि बहुमंजिली इमारतों में रहने वाले इस बात का ध्यान रखें कि जिस वातावरण में आप रह रहे हैं, वहां गमले में ही सही पर हरियाली को बरकरार रखें। बिल्डिंग में यदि जिम हो या आप टहलने जाते हों तब भी इसका उतना फायदा नहीं मिलेगा, क्योंकि जिस वातावरण में आप अधिक से अधिक समय बिता रहे हैं वह दूषित है। प्रो. अग्रवाल की एक सलाह यह है कि बहुमंजिली इमारतों में रहना अगर मजबूरी है तो बालकनी या छत पर जाकर शरीर में कुछ देर धूप अवश्य लगाएं, मौसम चाहे कोई भी हो।












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