विशेष : ... और तिरंगा बन गया राष्ट्र ध्वज
अहमदाबाद। किसी भी देश के स्वाभिमान का प्रतीक उसका राष्ट्र ध्वज होता है। भारत में इस राष्ट्र ध्वज का सफर सौ वर्ष से ज्यादा पुराना है। वर्तमान राष्ट्र ध्वज को 22 जुलाई, 1947 को भारतीय संविधान सभा ने स्वीकारा था। उसे आज 66 वर्ष हो गए हैं। दरअसल अपने देश का राष्ट्र ध्वज होने का पहली बार विचार राजा राम मोहनराय के मन में कौंधा था। उस समय फ्रांस में क्रांति चल रही थी। यह क्रांति फ्रांस के तिरंगे झंडे तले हुई थी। यह झंडा फ्रांस की बुनियादी समानता, भातृभाव तथा स्वतंत्रता की भावना से ओतप्रोत था।

राजा राम मोहन राय ने फ्रांस के तिरंगे झंडे को ही अपना लिया। इसके कुछ समय बाद अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, जिसके खिलाफ देश में जबर्दस्त आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन को छत्रछाया के लिए राष्ट्र ध्वज की वास्तविकत आवश्यकता महसूस की गई और फ्रांस के राष्ट्र ध्वज को ही मामूली फेरबदल कर भारतीय रूप दिया गया। इस प्रकार तैयार किए गए प्रथम राष्ट्र ध्वज को 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के फेडरेशन हॉल में सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की अध्यक्षता में सलामी दी गई। एक अन्य जानकारी के अनुसार पहला ध्वजवंदन कोलकाता के पारसी बगानस्क्वेयर ग्रीन पार्क में हुआ था। इस तिरंगे ध्वज में लाल, पीले और हरे रंग के तीन पट्टों थे। लाल पट्टों में चंद्रतारक, पारसियों के प्रतीक रूपी सूर्य और बीच वाले पीले पट्टे में गहरे आसमानी रंग से वंदे मातरम लिखा हुआ था।
मिदनापुर के एक क्रांतिकारी हेमचंद्र कानुंगो जब बम बनाने का प्रशिक्षण लेने के लिए फ्रांस गए, तो वहां उन्होंने मेडम भीखाइजी कामा को यह राष्ट्र ध्वज बताया। भारत से निर्वासित गुजरात के नवसारी की कामा ने 18 अगस्त, 1907 को जर्मनी के स्टुअर्ट गार्ड में आयोजित विश्व समाजवादी कांग्रेस के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह राष्ट्र ध्वज फहराया। ब्रिटेन ने इस सम्मेलन में हिन्दुस्तान की ओर से युनियन जेक नामक ध्वज फहराया था, लेकिन कामा ने इस ध्वज को हटा कर भारतीय ध्वज फहराया। इस ध्वज में लाल पट्टों में एक कमल और सप्तर्षि के सूचक सात तारक थे।
इसके बाद 1916 में होमरूल आंदोलन के समय राष्ट्र ध्वज पर पुनर्विचार किया गया और स्वराज की कल्पना के अनुरूप उसे रूप दिया गया। इस ध्वज में तीन चौड़े पट्टों की जगह पांच लाल, चार हरे समेत कुल नौ संकरे पट्टïे थे। उन पर ठीक मध्य में सप्तर्षि तारे और बाईं ओर शीर्ष पर मुस्लिमों का प्रतीक चंद्रतारक था। बाईं ओर एक चौथाई हिस्से में यूनियन जेक का समावेश किया गया था।
सन् 1920 में स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर महात्मा गांधी ने संभाली। एक वर्ष बाद गांधीजी ने सफेद, लाल और हरे रंग के पट्टों वाले ध्वज को राष्ट्र ध्वज के रूप में चुना। 1922 में अहमदाबाद में आयोजित कांग्रेस सम्मेलन में पहली बार राष्ट्र मान्य ध्वजवंदन हुआ। सिक्खों ने इस ध्वज में काला रंग शामिल करने का आग्रह किया, परंतु गांधीजी ने रंगों का अर्थघटन कौमों से नहीं करने का आग्रह किया।
1931 में ध्वज में लाल रंग की जगह शौर्य और समर्पण के प्रतीक केसरी रंग को शामिल किया गया। क्रम में फेरबदल कर ऊपर केसरी, बीच में सफेद और नीचे हरा रंग रखा गया। मध्य में सफेद पट्टों में उद्योग के प्रतीक के रूप में चरखे का चिन्ह रखा गया। इस ध्वज में केसरी रंग शौर्य और समर्पण, हरा रंग दाक्षिण्य व श्रद्धा तथा सफेद रंग शांति और सत्य का प्रतिपादन करता है। 1947 में जब स्वतंत्रता मिली, तो यही ध्वज राष्ट्र ध्वज बना गया।
स्वतंत्रता के बाद प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद की ओर से नियुक्त समिति ने निष्कर्ष दिया कि राष्ट्र ध्वज के मध्य में स्थित चरखे का चित्र दूसरी तरफ से उल्टा दिखता है। समिति ने चरखे की बजाए अशोक चक्र रखने का सुझाव दिया, जो दोनों ओर से समान दिख सके।
राष्ट्र ध्वज में ऊपर की ओर केसरी, मध्य में श्वेत और नीचे गहरे हरे रंग के तिरंगे में तीनों पट्टियों की चौड़ाई एक समान है। तिरंगे की लम्बाई-चौड़ाई का अनुपात 2:3 है। ध्वज पर जो प्रतीक है, वह सारनाथ में स्थित अशोक स्तंभ के शीर्ष पर के चक्र की प्रतिकृति है। यह चक्र बीच वाले पट्टों पर रखा गया है। सफेद रंग के पट्टों जितनी हीउसकी चौड़ाई है। गहरे भूरे रंग के अशोक चक्र में 24 दांते हैं। 22 जुलाई, 1947 को संविधान सभा ने इस तिरंगे को राष्ट्र ध्वज के रूप में अपनाया।












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