कभी थी बेंगलुरू की खूबसूरती, आज है प्यासी
बैंगलुरू। बेंगलुरू में झीलों के किनारे हाल के वर्षो में अनगिनत आवासीय और व्यावसायिक इमारतें बनी हैं और अभी भी बन रही हैं। इन इमारतों के निर्माण के कारण यहां की झीलें सूखने लगी हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि झीलों के किनारे हो रहे निर्माणों को रोका जाना चाहिए, वरना ये भी नहीं बचेंगी। सन् 1950 के आस-पास बेंगलुरू में 900 झीलें थीं, लेकिन अब मात्र 200 झीलें ही बच गई हैं। बाकी झीलें कचरा फेंके जाने के कारण गंदली हो चुकी हैं और उनका अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर है। ये बची हुई 200 झीलें काफी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कावेरी नदी में पानी कम होने पर शहर को पानी की आपूर्ति के लिए इन्हीं झीलों पर निर्भर रहना पड़ता है।
1990 के दशक में बेंगलुरू के आईटी हब बनने के साथ शहर की आबादी भी बढ़ने लगी। आबादी बढ़ी तो बेतहाशा जलदोहन होने लगा। यही वजह है कि यहां का जलस्तर धीरे-धीरे नीचे की ओर चला गया। हालात ये हो गए हैं कि एक हजार फीट गहरी खुदाई के बाद भी पानी मुश्किल से मिल पाता है।
शहर में लगातार मकानों के बनने से अब हालात ये हो गए हैं कि आने वाले 10 वर्षो में शहर में पानी की समस्या और विकट हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेंगलुरू में झीलों का अस्तित्व समाप्त होने के बाद शहर के हालात खराब हो जाएंगे, लोग पानी के लिए तरसेंगे। इन झीलों को बचाने की गरज से उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है।
पर्यावरण विशेषज्ञ वी.एम. हेग का कहना है कि बेंगलुरू की झीलों को बचाने की जरूरत है और इसके लिए झीलों के किनारे किसी भी तरह के निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हेग ने यह भी कहा कि अगर किसी झील के किनारे मकान बनाने की इजाजत दी गई है तो उसे वापस लिया जाना चाहिए। एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि बेंगलुरू की अधिकांश झीलों के सूखने का कारण है उनके किनारे बहुमंजिला इमारतों का बनना। अगर बेंगलुरू विकास प्राधिकरण इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं देता है तो आने वाले दिनों में शहर में गंभीर जलसंकट उत्पन्न हो सकता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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