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क्‍या हो अगर मिस्र की सेना जैसा करे भारतीय फौज?

[नवीन निगम] आज जो मैं लिखने जा कहा हूं उसे शायद भारत में राजद्रोह की संज्ञा दी जाए लेकिन मिस्र में जो कुछ हुआ उसे देखकर मन में एक ही बात उठती है कि काश भारतीय सेना अपनी वफादारी को सरकार के प्रति नहीं जनता के प्रति समझे। देश आज केवल और केवल एक ही संस्था पर विश्वास करता है और वह संस्था हैं सेना। जो दुश्मनों से तो बचाती ही है देश के अंदर और बाहर आतंकवाद से निरंतर लड़ती रहती है और हमारे देश में गरीब जनता नेताओं के घोटालो में पिसती रहती है। क्यों नहीं सेना भारत की जनता को इन नेताओं से निजात दिलाती है।

यकीन मानिए यदि किसी दिन सेना ने यह किया तो लोकतंत्र की दुहाई देने वाले इन नेताओं को जनता सड़कों पर पीटेंगी ही नहीं बल्कि सड़कों पर निकल कर दिवाली भी मनाएंगी। सोचिए, कैसे लोग नेता बनते ही बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में घूमने लगते है। मेरे लेख पर लोग भड़क सकते है कह सकते है कि मैं तानाशाही को बुला रहा हूं। देश की जो दशा है क्या उससे ज्यादा खराब दशा हो सकती है। क्या तानाशाही इसे और खराब कर सकती है? मिस्र के सैन्य प्रमुख जनरल अब्देल फताह सीसी का कहना था कि सेना की देश पर शासन करने की कोई इच्छा नहीं है। उन्होंने कहा कि मिस्र से सहयोगी देशों को इस बारे में चिंतित होने की जरूरत नहीं है कि यह कोई सैन्य तख्तापलट है। यह बयान यह दर्शाने के लिए काफी है कि सेना जनता के प्रति जवाबदेह है न कि सरकार के प्रति।

यदि सरकार जनता की परेशानियां नहीं समझती तो सेना को उसे उखाड़ फेंकने का पूरा अधिकार है। मैं यह नहीं कह रहा कि सेना ऐसा बारबार करें लेकिन जब नेताओं को यह लगने लगे कि वह सत्ता में आते जाते रहेंगे ही, तो उन्हें जनता की चिंता कहा रह जाती हैं। आज जो विपक्ष में हैं वह जनता की नाराजगी के चलते अगली बार सत्ता में आ जाता हैं। जैसे कई राज्यों में जनता गुस्सा होकर किसी पार्टी या नेता को खारिज करती है लेकिन अगले चुनाव में वह फिर जीतकर वापस सत्ता पर काबिज हो जाता हैं। क्योंकि जनता के पास कोई विक्लप नहीं हैं। जब सासंदों का वेतन बढऩा होता है तो सब एक हो जाते हैं। जब आरटीआई राजनीतिक दलों पर लागू होता है तो सब एक साथ विरोध करते हैं। लेकिन जब जनता को अधिकार मिलना होता है तो उसे या तो लटकाते है या विरोध करते है।

1857 में ब्रिटिश सेना में काम करने वाले सैनिकों ने क्यों जंग लड़ी इसीलिए क्योंकि भारतीय जनता ईस्ट इंडिया कम्पनी की लूट-खसोट से परेशान हो चुकी थी इसीलिए 1857 की लड़ाई खत्म होने के बाद ब्रिटेन ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। 1946 में आजाद हिंद फौज के जवानों पर जब अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया तो भारतीय नौसेना ने एक दिन की बगावत कर दी। सेना के दबाव में ही अंग्रेजों ने आजाद हिंद के फौजियों की सजाए माफ की। आप उसे न्यायालय में अच्छी पैरवी करने का परिणाम कह सकते है। अच्छी पैरवी तो कई केसों में की गई थी लेकिन उन मामलों में अंग्रेज कभी नहीं झुके। 1946 में नौसेना और सेना के हल्के से विरोध ने ही अंग्रेजों को बता दिया था कि अब ज्यादा दिन भारत पर कब्जा बरकरार रखना मुश्किल होगा।

इन बातों से यह साबित होता है कि भारतीय राजनीति में सेना हमेशा से अपना रोल निभाती रही है। क्योंकि देश की जनता को खूनी क्रांति करने की न ही आदत है और न ही उसकी ऐसी मानसिकता रही हैं, लेकिन सेना को तो अपना रोल नहीं भूलना चाहिए। भारतीय नेताओं को सेना का भय रहना चाहिए कि वह शासन की स्थिति ज्यादा खराब करेंगे तो देश में कोई ऐसी शक्तिी है जो उन्हें सबक सिखा सकती हैं। अन्ना के आंदोलन के समय सेना ने कोई हलचल क्यों नहीं की। सेना हल्की सी हरकत करती तो सरकार दौड़ कर जनलोकपाल बिल बनावाती ही नहीं उसे तुरंत लागू भी करवाती।

क्यों सरकार आज न्यायालय से डरती क्योंकि न्यायालय ने कई बार सरकार को अपनी गिरफ्त में लेकर उसे सबक सिखाया क्यों आज नेता हो या बड़े से बड़ा प्रशासनिक अधिकारी, कोर्ट और किसी जज का सामना होता ही भय से कांप जाता है क्योंकि न्यायालय ने सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराया और न्यायालय के पीछे हर बार जनता खड़ी दिखाई पड़ी। सेना को अपनी वफादारी के प्रति एक बार फिर सोचना होगा क्या वह देश की जनता के प्रति वफादारी निभाएंगी कि बेईमान नेताओं से बनी सरकार की।

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