तबाही के बाद अब बीमारी का खतरा, महामारी को कौन देगा मात?
देहरादून। पिछले 10 दिनों से देवभूमि में तबाही मची हुई है। कुदरत ने यहां सब कुछ नष्ट कर दिया है। भारी बारिश, बाढ़ और बादल फटने की वजह से उत्तराखंड में सबकुछ तहस-नहस हो चुका है। हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। कई हजार लोग पहाड़ों में फंस गए है।
सेना राहत-बचाव में जुटी हुई है। जिंदा लोगों को बचाकर सुरक्षित जगह पर पहुंचाना सेना का प्रमुखता है। पहाड़ों में फंसे हजारों लोगों को सेना निकाल रही है, लेकिन इस बीच कई दिनों से जहां तहां पड़े शवों के कारण अब यहां बीमारी का खतरा बढ़ गया है। पिछले 10 दिनों से शवों के पड़े होने के कारण घाटी में दुर्गंध फैल गई है।

शवों के गंगा में बह जाने के कारण पानी के विषैला होने का खतरा बढ़ गया है। चील-कौवे शवों को नोंच रहे है। घाटी की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। ऐसे में सेना के लिए ये एक नयी चुनौती बन गई है। जिन शवों की पहचान हो गई है कल उनका केदारनाथ धाम में सामूहिक संस्कार किया गया है। देवभूमि पर महामारी की आशंका के बीच पहाड़ पर जलप्रलय में मारे गए सैकड़ों लोगों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। डीएनए नमूना लेने के बाद कल केदारनाथ में 18 शवों का सामूहिक रूप से विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
केदारनाथ में अंतिम संस्कार का काम पूरा होने के बाद ही रामबाड़ा और गौरीकुंड में मिले शवों का अंतिम संस्कार किया जाएगा। तबाही के बाद पहाड़ों पर महामारी का खतरा बढ़ जाने के बाद सरकार ने कदम बढ़ाने शुरु कर दिए है। शवों के सड़ने से महामारी से आशंकित स्वास्थ्य विभाग ने बीमारियों से निपटने की कवायद तेज कर दी है। उत्तराखंड में इंटिग्रेटेड डिजीज सर्विलान्स प्रोग्राम शुरू किया है। शवों के सड़ने के बाद महामारी का खतरा देखते हुए जगह-जगह ब्लीचिंग पाउडर का छिंड़काव किया जा रहा है। कमेटी बनाकर इसे रोकने का काम किया जा रहा है। केन्द्र और राज्य स्तर पर महामारी से निपटने के लिए प्रोग्राम चालाए जा रहे है।












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