कहीं तालिबान को सत्ता देना तो नहीं चाहता है अमेरिका
[नवीन निगम] आज अमेरिका अफगानिस्तान में उसी मुकाम पर आकर खड़ा हो गया जिस जगह पर कभी ब्रिटेन (भारतीय ब्रिटिश सेना) और सोवियत संघ खड़े थे। इन दोनों ने भी अफगानिस्तान की राजनीति पर नियत्रंण करने की कोशिश की थी और असफल रहे थे और एक समय ऐसा आया था जब यह अफगानिस्तान छोड़कर जाना चाहते थे लेकिन इन्हें रास्ता नहीं मिल रहा था पर फिर भी यह छोड़कर चले गए। आज अमेरिका जिसने आतंकवाद के खिलाफ बड़े-बड़े वादे किए थे।
वो भी अफगानिस्तान को अपनी किस्मत पर छोड़कर भाग जाना चाहता है और तालिबान के साथ शांति वार्ता की उसकी पहल उसकी इस मजबूरी को साफ दिखला रही है कि वह अफगानिस्तान में आतंक के नाम पर लड़ता-लड़ता थक गया हैं और अफगानिस्तान में इराक की तरह तेल भी तो नहीं निकलता हैं। जिसके लालच में अमेरिका वहां रुका रहे। अपने सैनिकों को और मारवाने के लिए अब अमेरिका तैयार नजर नहीं आ रहा है। आएये जानते है कि अफगानिस्तान में अब अमेरिका कौन सी नई व्यवस्था में लगा है। अमेरिका अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार को भी अब मंजूर करने के लिए तैयार है, पर वह तालिबान को पाक की सरपरस्ती में छोडऩा चाहता है।

क्योंकि अमेरिका जानता है कि बगैर पाक की सहायता के तालिबान न अफगानिस्तान में काबिज हो सकता है और न ही सरकार चला सकता है। अमेरिका की यही रणनीति है कि तालिबान की तरफ से पाक अमेरिका को भरोसा दिलाए कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल अमेरिका और उसके मित्र देशों के खिलाफ आतंक फैलाने में नहीं करेगा। और अल कायदा से वो अपने संबंध तोड़ लेगा। 12 साल से अफगान सत्ता से बाहर चल रहे तालिबान इस बात पर सहमत हो सकते है क्योंकि मुल्ला उमर का अब कोई पता नहीं है और लादेन मारा जा चुका है। तालिबान भी समझ रहा है कि उसे अफगानिस्तान में काबिज होना है तो उसे नोटो की बात माननी होगी।
दूसरी तरफ नई दिल्ली में भारत अमोरिका संबंधों पर वार्ता के लिए आए अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी के दिल्ली में दिए बयानों से जाहिर हुआ कि अफगानिस्तान से हटने का मकसद पूरा करने के लिए तालिबान से बातचीत करने को तैयार हुआ अमेरिका फिलहाल ऐसा कुछ नहीं करना या कहना चाहता जो पाकिस्तान को अच्छा नहीं लगे। इसलिए कि तालिबान की डोर पाकिस्तान के हाथ में है।
इसीलिए जब अफहान राष्ट्रपति करज़ई ने तालिबान के झंडे और निशान, इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफगानिस्तान के चलते तालिबान के कार्यालय का विरोध किया था उनका कहना था कि तालिबान यह दिखाना चाह रहा है कि वह निर्वासित सरकार है। उन्होंने अपनी सरकार की ओर से बातचीत के लिए अधिकृत उच्च शांति परिषद को चेतावनी दी कि वे तब तक शांति वार्ता में हिस्सा न लें जब तक तालिबान का अफगान नेतृत्व न हो। तालिबान से दोस्ती के लिए अमेरिका इतना उतावला है कि उसने कतर सरकार से कहकर तालिबान का झंडा और निशान उतरवा दिए। तभी जाकर करजई नरम पड़े।
काबुल में मंगलवार के हमले के बाद करज़ई ने कहा कि तालिबान ऐसा नहीं कर सकता कि एक ओर तो कतर में शांति वार्ता के लिए कार्यालय खोले और दूसरी ओर अफगानिस्तान में लोगों को मारना जारी रखे। अमरीकी राजदूत जेम्स कनिंघम का कहना है कि हमले का उद्देश्य सफल नहीं हो पाया है और इसने हिंसा और आतंक के ज़रिए अपने लक्ष्य को पाने की तालिबान की कोशिशों की निरर्थकता को ही साबित किया है। यानी अमेरिका तालिबान को यह समझाना चाहता है कि वह यदि अमेरिका की शक्ति के आगे झुक जाए तो वह अफगानिस्तान में उन्हें राज चलाने की अनुमति दे सकता है जिस प्रकार वह पाकिस्तान को अपनी गिरफ्त में रखता है।
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जे कार्नी ने उच्च शांति परिषद और तालिबान के अधिकृत प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के लिए दोहा में कार्यालय का फिर समर्थन किया। पिछले हफ़्ते नाटो से अफगान सेनाओं को सुरक्षा की जि़म्मेदारी स्थानांतरित करने, अफगान नेतृत्व वाले सामंजस्य के प्रयासों, अफगानिस्तान में 2014 में होने वाले चुनाव और द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर बातचीत के बारे में भी चर्चा की। कार्नी के अनुसार दोनों राष्ट्रपतियों ने माना कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव अफगानिस्तान के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।












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