साक्षात्‍कार- छत्तीसगढ़ में सुरक्षा तंत्र से चूक हुई : पूर्व पुलिस प्रमुख

रायपुर। छत्तीसगढ़ में पिछले महीने हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के कई नेताओं की जान गई। इसी हमले में गंभीर रूप से घायल वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल को भी हमने मंगलवार को खो दिया। राज्य में व्याप्त नक्सली समस्या पर हमने पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन से बातचीत की। पेश है, बातचीत के मुख्‍य अंश:

प्रश्‍न- 25 मई की घटना के पहले बस्तर में राजनीतिक हलचल बढ़ी थी। ऐसे में क्या जो घटना हुई वह लोकतांत्रित माहौल को लेकर हुई बौखलाहट का नतीजा है?

जवाब- मैं कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं करना चाहता, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के पहले यात्राएं होती रहती हैं। नक्सली ऐसे मौके की ताक में थे। उन्होंने असानी से हादसे को अंजाम दिया। ऐसे समय में सुरक्षा तंत्र को चौकन्ना रहना चाहिए था, मगर नहीं रहा।

Naxalite

प्रश्‍न-25 मई की घटना को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के अलावा न्यायिक जांच भी जांच कराई जा रही है। क्या बस्तर में सुरक्षा तंत्र का सही उपयोग नहीं किया जा रहा है? हमें संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह से करना चाहिए?

जवाब- नक्सली बहुत आधुनिक नहीं हैं। उनके पास भी वही बंदूकें हैं, जो सुरक्षा तंत्र के पास हैं। जो लोग कहते हैं कि दरभा घाटी में बड़ी संख्या में नक्सली थे, ये तो कयास भर है। सौ-डेढ़ सौ बड़ी संख्या नहीं है। दरभा घाटी वैसे भी नक्सली इलाका है। यहां पहले से ही उनकी सक्रियता है। ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने चेतावनी नहीं दी थी। नक्सलियों की चेतावनी के बावजूद रोड ओपनिंग नहीं की गई, जबकि उनका मंसूबा अटैक का था। इंडेफ डिप्लॉयमेंट नहीं होना चाहिए, मैं इससे सहमत नहीं हूं। फोर्स बाहर से भी लाई जा सकती थी। चूक तो हुई है, यह इन डिफेंसिएबल है। दरअसल, बेसिक सुरक्षा ही नहीं थी।

प्रश्‍न-सुरक्षा में आगे चूक न हो, इसके लिए सरकार को, सुरक्षा बलों को क्या करना चाहिए?

जवाब- उन्हें मालूम है कि उन्हें क्या करना चाहिए। छत्तीसगढ़ पुलिस, सीएफ, एसटीएफ, कोबरा बटालियन, सीआरपीएफ जंगलवार फेयर में ट्रेंड हैं। जरूरत है दबाव बनाने की, नक्सलियों पर लगातार दबाव बनाए रखने की। कैसे प्रोटेक्ट करें यह भी ध्यान रखना जरूरी है। दरबा में सुरक्षा जवान कम थे। जवान ज्यादा होते तो 30 लोग नहीं मारे जाते। फोर्स होने पर दबाव के चलते नक्सली पीछे हट सकते थे। ऐसे में बड़ा हादसा नहीं हो पाता।

प्रश्‍न- बस्तर में इस वक्त कितने नक्सली हो सकते हैं?

जवाब- मेरी जानकारी के मुताबिक बस्तर में इस वक्त पंद्रह हजार नक्सली हैं। लेकिन वे माओवादी हमले, गुरिल्ला युद्ध और पुलिस- तीनों की ही कार्यप्रणाली से वाकिफ हैं। वे कोई भी पैंतरा कभी भी बदल कर घटना को अंजाम दे देते हैं।

प्रश्‍न- कहा जाता है कि यह विचारधारा की लड़ाई है। क्या इसका अंत संभव है? नक्सली जंगल से आकर लोगों पर हमला करते हैं और गांवों में छुप जाते हैं। क्या ऐसे में इन पर जीत हासिल की जा सकती है?

जवाब- नक्सली अपनी तयशुदा रणनीति के तहत ही लड़ाई लड़ते हैं। वे हर लड़ाई को मन लगाकर अंजाम देते हैं। गांव वाले उन्हें प्रश्रय देते हैं, यह मैं नहीं मानता। वे जंगलों में ही रहते हैं और वहीं से लोगों को निशाना बनाते हैं।

प्रश्‍न- केंद्र और राज्य सरकार जल्द ही संयुक्त अभियान शुरू करने का निर्णय ले चुके हैं, क्या यह अभियान सफल हो पाएगा?

जवाब- बारिश के तीन महीनों में जंगली इलाकों में भीतर जाकर नक्सलियों पर हमला करना मुश्किल होगा। यहां इतना अंधेरा होता है कि भीतर जाने में कई दिक्कतें आती हैं। ऐसे में केंद्र-राज्य का संयुक्त अभियान बारिश में कितना सफल हो पाएगा, यह कहना मैं अभी से उचित नहीं मानता। लेकिन ऐसे ऑपरेशन बारिश में शुरू करने से पहले विचार जरूर करना होगा।

प्रश्‍न- अंत में एक सवाल, क्या बस्तर में नक्सली लड़ाई किसी नतीजे पर पहुंच सकती है?

जवाब- हमें नक्सलियों के खिलाफ लड़ने का मन बनाकर चलना होगा। ऊहापोह की स्थिति केंद्र और राज्य के बीच नहीं होना चाहिए। यह एक लंबी लड़ाई है, ऐसे में ऊंच-नीच होती ही रहती है। मगर हमें सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाए रखना होगा। यह एक दीर्घकालीन लड़ाई है और जीत लोकतंत्र की होगी, ऐसी मुझे उम्मीद है।

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