टूट रही है कार्यकर्ता के दिल में बसी आडवाणी की मूरत

BJP workers do not like Advani
लखनऊ। अभी दो दिन पहले जहां भाजपा कार्यकर्ता दीवाली मना रहे थे वह आडवाणी के इस्तीफे के बाद इस तरह सदमे में हैं जैसे चुनाव में बुरी तरह पराजित हो गए हो। कार्यकर्ताओं को यकीन नहीं हो रहा है कि यह वही आडवाणी है जो अुनशासन में रहने की सीख हमेशा पार्टी के कार्यकर्ताओं को देते रहते हैं। लखनऊ में पार्टी के एक बड़े
पदाधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर तीन महीने के पहले एक सम्मेलन की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में लालकृष्ण आडवाणी ने हमसे कहा था कि भाजपा में भीतरी अनुशासन की कमी के कारण आपसी संबंधों को कमजोर होने की इजाजत दी गई तो हम पार्टी की छवि अंदरूनी मतभेदों वाले संगठन की बना देंगे। संगठन की कोई भी असहमति सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए और उसे उचित मंच पर ही उठाया जाए।

आज भाजपा के कार्यकर्ताओं को आडवाणी क्या जवाब देंगे। उन्होंने भीष्म पितामह की तरह पार्टी के लिए जो नियम बनाए वहीं उसे तोडऩे पर तुले हैं। एक अन्य भाजपा नेता जो अमित शाह के करीबी माने जाते है ने कहा कि महाभारत में भीष्म पितामह ने सेनापति बनने के समय केवल एक शर्त लगाई थी कि उनकी सेना में कर्ण नहीं लड़ेगा। लड़ाई के हिसाब से यह बात भी गलत थी लेकिन इसे उनके अर्जुन के प्रति लगाव के कारण मान लिया गया।

लेकिन हमारे (भाजपा) पितामह तो अपने राजतिलक के लिए यह सबकुछ कर रहे हैं। जिससे हम बहुत आहत है। भाजपा कार्यालय में दबी जुबान में अनेक भाजपा कार्यकर्ता यह कहते सुने गए। एक कार्यकर्ता ने तो कहा कि अभी तक हम सपा का मजाक उड़ाते थे कि अखिलेश का काम उनके पिता मुलायम को ही पसंद नहीं आ रहा हैं। लेकिन आज दूसरी पार्टी के लोग हमारा मजाक उड़ा रहे हैं। हमने तो कल्पना भी नहीं की थी कि हमेशा पार्टी को अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले हमारे आडवाणी जी ऐसा करेंगे। उन्हें क्या हो गया हमारी समझ से बाहर हैं। एक कार्यकर्ता ने तो यहा तक कयास लगा डाला कि लगता है कि आडवाणी जी को नीतीश कुमार और शरद यादव जैसे लोगों ने उकसाया है कि वो इस तरह की पहल करें नहीं तो क्या आदरणीय आडवाणी जी जानते नहीं थे कि उनके इस कदम से उप्र जैसे राज्यों में क्या असर
पड़ेगा जहां हम मोदी जी के नेतृत्व में खड़े होने जा रहे थे।

कुल मिलाकर उप्र खासतौर पर लखनऊ में तस्वीर यह हैं कि भाजपा का कार्यकर्ता बहुत दुखी है और जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है वह आडवाणी की अपने अंदर बनी मूरत को तोड़ता जा रहा हैं। आडवाणी ने जिन्ना के बारे में बोलकर अपना उतना नुकसान नहीं किया था लेकिन उनका यह इस्तीफा भाजपा कार्यकर्ताओं को उनसे बहुत दूर ले जाएगा जब सेना ही अपने मन से नीचे उतार देंगी तो आडवाणी कर सके नेता रह जाएंगे। आडवाणी ने अपने इस्तीफे के साथ पार्टी के कार्यकर्ता के दिल से भी इस्तीफा दे दिया हैं। जो उन्हें भगवान की तरह पूजता था।

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