अब भाजपा के क्षत्रप ही चलाएंगे पार्टी को

लखनऊ।(नवीन निगम) आखिरकार भाजपा के आम कार्यकर्ता के आगे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को झुकना ही पड़ा। सूत्र बताते है कि गोवा में रविवार की सुबह एक ऐसा समय भी आया, जब आडवाणी की नाराजगी को देखते हुए नरेंद्र मोदी को चुनाव समिति का केवल संयोजक बनाने की बात चली लेकिन कार्यकर्ताओं के उल्लास और जगह-जगह से जब शीर्ष नेतृत्व को यह खबर मिली की, पार्टी कार्यकर्ता मोदी के नाम की घोषणा को लेकर इतने उत्साहित है कि वो आतिशबाजी का इंतजाम कर रहे है तो शीर्ष नेतृत्व फिर अपने पुराने फैसले पर वापस आ गया।

बताया जा रहा है कि सुबह जब संयोजक बनाने की बात संघ के सामने रखी गई तो संघ ने इसे अस्वीकार कर दिया। तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने फैसला ले लिया कि मोदी को पूरी तरह कमान सौंप दी जाए। भाजपा की गोवा की कार्यकारिणी इसलिए नहीं याद रखी जाएंगी कि इसमें नरेंद्र मोदी को चुनाव समिति का अध्यक्ष चुना गया, बल्कि इसे याद रखा जाएगा क्योंकि यहां से भाजपा ने एक नई राह तय की और वह राह है कि अब भाजपा में क्षत्रप राज करेंगे।

Narendra Modi
नरेंद्र मोदी सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, वैकेया नायडू और उनके ही जैसे कई शीर्ष नोताओं के न चाहते हुए भी ऊपर इसलिए आ पाए क्योंकि सुषमा और आडवाणी के साथ शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, मनोहर पाणिकर जैसी भाजपा की क्षेत्रीय शक्तियां उनके साथ नहीं थी। भाजपा में अब दिल्ली में बैठकर राजनीति करने की कांग्रेसी संस्कृति का अंत कर दिया गया है। राजनाथ सिंह भी इसीलिए टिके रहे क्योंकि वह दिल्ली के साथ उप्र की भी राजनीति करते है और लोकसभा का चुनाव उप्र से लड़ते है।

गोवा में देखे तो भाजपा के वह नेता छाए हुए थे जो भाजपा के विभिन्न राज्यों में या तो मुख्यमंत्री है या रह चुके है। भाजपा की राजनीति को अब यही क्षत्रप कंट्रोल कर रहे हैं। सुषमा स्वराज को आज समझ में आया होगा कि एक समय था जब नरेंद्र मोदी और वह दिल्ली में राजनीति करते थे और तब सुषमा स्वराज, नरेंद्र मोदी से आगे ही थी। लेकिन नरेंद्र मोदी दिल्ली से बाहर गए एक खास इलाके में पहचान बनाई और भाजपा को विजय दिलाई और विजयी होकर वापस दिल्ली लौट रहे हैं।

क्यों अरुण जेटली और सुषमा स्वराज मोदी के कद के बराबर नहीं हो पाए। क्यों भाजपा का कर्याकर्ता शिवराज, रमन सिंह, नरेंद्र मोदी, वसुंधरा राजे और सुशील मोदी के साथ हैं। क्योंकि यह क्षत्रप ही भाजपा को विजय मार्ग पर ले जाते है। आज दिल्ली में बैठने वाले भाजपा के किस नेता के लिए राज्यों में दिवाली जैसा माहौल पैदा हो पाता है। क्षत्रपों की भाजपा में बढ़ती शक्तिी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, मोदी से लड़ाई हार चुके भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को अपनी आखिरी गोली दागने के लिए शिवराज के कंधे का सहारा लेना पड़ा यानी कि एक क्षत्रप को दबाने के लिए दूसरे क्षत्रप को बुलाना पड़ा और जब उस क्षत्रप ने लडऩे से इनकार कर दिया तो नाराजगी के हथियारों का सहारा लेना पड़ा। यह इस बात को साबित करता है कि भाजपा में अब दिल्ली में बैठकर संसदीय राजनीति के दिन लद गए है अब यदि आपको भाजपा की राजनीति में शीर्ष पर पहुंचना है तो किसी खास इलाके में आपकी पैठ होनी चाहिए।

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