हेमा मालिनी जी, मोदी में अटल को तो नहीं तलाश रही भाजपा?

मथुरा/लखनऊ (नवीन निगम)। भारतीय जनता पार्टी से पूर्व सांसद व बॉलीवुड अभिनेत्री हेमा मालिनी ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी लोकसभा चुनाव में उत्‍तर प्रदेश में कहीं से भी चुनाव लड़ सकते हैं। हेमा जी का यह बयान और लखनऊ में भाजपा कार्यालय में मोदी की चर्चाएं एक सवाल को जन्‍म दे चुकी हैं। वो यह कि कहीं भाजपा नरेंद्र मोदी के अंदर दूसरे अटल को तो नहीं तलाश रही है?

मथुरा में ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर के दर्शन करने के बाद हेमा मालिनी ने जब कहा कि नरेंद्र मोदी ही पीएम पद के सही उम्‍मीद वार हैं, तो मीडिया ने पहला सवाल पूछा- मोदी चुनाव कहां से लड़ेंगे। तो उन्‍होंने कहा कि वो कहीं से भी चुनाव लड़ सकते हैं, पार्टी उनके नेतृत्‍व में सफलता जरूर हासिल करेगी। इसके अलावा उन्‍होंने चीनी घुसपैठ और सरबजीत सिंह की मौत के मामले पर केंद्र सरकार को उसी प्रकार कोसा, जैसे कि अन्‍य नेताओं ने।

भ्‍मउं

मोदी के लिये कुर्बानी को तैयार टंडन

बात यहां खत्‍म नहीं होती है क्‍योंकि हाल ही में भाजपा कार्यालय में इस बात की खबर उड़ी थी कि मोदी लखनऊ से चुनाव लड़ेंगे। पिछले दिनों इस चर्चा ने खास जोर इसलिए भी पकड़ा क्योंकि लखनऊ सीट से सांसद लालजी टंडन ने इस बात का इशारा किया कि यदि अटल की इस सीट से मोदी लडऩा चाहते है तो वह सहर्ष सीट छोडऩे के लिए तैयार हैं। लालजी टंडन भले ही ऐसे नेता न रहे हो जिन्होंने अपनी जिंदगी में कई चुनाव लड़े हो लेकिन वह राजनीतिक रूप से काफी महत्वाकांक्षी है और राजनीति में आने वाली नई हवा को बखूबी पहचान लेते है।

कोई भी सांसद हो और वह भी पूर्व प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र से तो वह अपने आप ही महत्वपूर्ण हो जाता है ऐसे में वह कभी नहीं चाहेगा कि वह सीट उससे कोई छीन ले। फिर लालजी टंडन जिन्हें उनके विरोधी किसी और नाम से भी बुलाते है यह त्याग करने के लिए क्यों तैयार हो रहे है। इसे समझना होगा। उप्र में कभी कल्याण के जाने के बाद राजनाथ, कलराज मिश्र और लालजी टंडन नेता होते थे। राजनाथ औरकलराज पहले से राजनैतिक व्यक्ति रहे थे लेकिन लालजी टंडन ज्यादातर एमएलसी रहे, लेकिन अटल के प्रभाव से हमेशा अच्छे मंत्री पद पर विराजमान रहे। मायावती- भाजपा के गठबंधन में भी लालजी टंडन ने अहम भूमिका निभाई। मायावती द्वारा उन्हें राखी बांधने के प्रकरण के बाद वह और शक्तिशाली तो हो गए लेकिन वह प्रदेश भाजपा के अन्य बड़े नेताओं की आंख में खटकने लगे।

क्‍या हुआ था विधानसभा चुनाव में

सूत्र बताते है कि बहुत पहले जब टंडन एमएलसी हुआ करते थे तब चुनाव में टिकट बांटने को लेकर भाजपा में हो रही बहस के दौरान एक पूर्व विधायक ने अपना टिकट काटे जाने से खफा होकर टंडन की ओर इशारा करते हुए कहा कि जिन्होंने कभी नगर निगम का चुनाव नहीं लड़ा वह क्या जाने की चुनाव कैसे लड़ा जाता है। इस बात से खफा होकर लालजी टंडन ने भी चुनाव लडऩे का फैसला किया। लेकिन लखनऊ के जिस इलाके में वह प्रसिद्ध थे वह इलाका लखनऊ पश्चिम विधानसभा में आता था जहां रामकुमार शुक्ला लगातार चुनाव जीतते आ रहे थे और कल्याण सिंह के नजदीकी माने जाते थे लेकिन अटल के बढ़ते कद और उप्र में मंत्री रह चुके लालजी टंडन ने रामकुमार शुक्ला से यह सीट छीन ली और आसान विजय दर्ज कराई।

जब तक अटल सत्ता में रहे लालजी टंडन उत्तर प्रदेश खासतौर पर लखनऊ में अटल के उत्तराधिकारी रहे। लेकिन जब अटल ने राजनीति से संन्यास लिया तो उनकी सीट पर लालजी टंडन ने दावा किया, लोग बताते है कि उप्र के अन्य नेता उनके इस दावे को कबूल करने के मूड में नहीं थे लेकिन अटल जी के यह कहने के बाद उन्हें यह सीट लडऩे के लिए मिली। 2001 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ से टंडन दूसरे नम्बर पर रही कांग्रेस की रीता जोशी बहुगुणा से मात्र 40 हजार वोट से जीते। जबकि अटल के समय में यह अंतर एक लाख से ज्यादा का होता था। रीता जोशी बहुगुणा जिन्होंने अंतिम समय में पर्चा भरा था, ने जोरदार टक्कर दी थी। टंडन को रीता से 40 हजार और बसपा के अखिलेश दास से मात्र 70 हजार वोट ज्यादा मिले थे। यदि रीता और अखिलेश दास के बीच वोट न कटता तो टंडन चुनाव हार भी सकते थे।

क्‍या चाहते थे टंडन

इसके अलावा जब 2001 में टंडन लोकसभा के लिए चुन लिए गए तो उनकी एमएलए की सीट खाली हो गई। टंडन यहां से अपने बेटे को उपचुनाव लड़ाना चाहते थे लेकिन भाजपा के अंदर उनके खिलाफ ऐसी राजनीति हुई कि उनके लड़के को यह सीट नहीं मिल सकी। लालजी टंडन तभी से समझ गए कि अटल के जाने के बाद उप्र भाजपा में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उन्हें किसी नए अटल को तलाशना पडेगा और राजनैतिक रूप से काफी चतुर रहे टंडन यह राह तलाशते रहे।

बाद में हुए उपचुनाव में भाजपा कांग्रेस के हाथों यह सीट हार गई तब भी टंडन पर प्रदेश भाजपा के कई नेताओं ने चोरीछुपे यह आरोप लगाया कि टंडन ने लखनऊ पश्चिम का यह चुनाव भाजपा को जानबूझकर हरा दिया। टंडन इस आरोप से आहत रहे। बाद में 2012 में लखनऊ पश्चिम सीट से उनके लड़के को टिकट मिल गया लेकिन सपा में आईआईएम की प्रोफेसरी छोड़कर आए अभिषेक मिश्र ने गोपाल टंडन को इस सीट पर हरा दिया। सपा ने पहली बार यह सीट जीती और अभिषेक मिश्र इस सीट को बचाए रखने के लिए क्षेत्र में तेजी से विकास के कामों में लगे है। एक तो पहले ही भाजपा के अंदर उनके विरोधी उन्हें परेशान किए थे फिर पिछले लोकसभा चुनाव में उनका कम अंतर से जीतना और पुत्र का परंपरागत सीट से हार जाना उन्हें परेशान किए हुए है। ऐसे में उन्हें यदि कोई नया अटल (मोदी) मिल जाए तो उनकी सभी परेशानियों का अंत हो सकता है। मोदी यदि लखनऊ से चुनाव लड़ते है तो हिदुत्व की लहर पैदा होगी और वह आसानी से चुनाव जीत जाएंगे। अटल की सीट से लड़ते ही वह भाजपा में अटल के उत्तराधिकारी हो जाएंगे जो उन्हें पीएम बनाने में सहायक होगा। लालजी टंडन क्योंकि यह सीट छोड़ंगे तो आगे चलकर केंद्रीय मंत्री और परिवार के लिए वह नरेंद्र मोदी से भी बहुत कुछ हासिल कर सकेंगे।

यह भी संभव है कि अटल के उत्तराधिकारी बनने के लिए मोदी लखनऊ और गुजरात की किसी सीट से चुनाव लड़े और पीएम बनने के बाद लखनऊ की सीट छोड़ दे। ऐसे में लालजी टंडन को सीट भी मिल जाएंगी और केंद्रीय मंत्री का दर्जा और पीएम के विश्वासी होने का तमगा। जब एक चाल से इतना कुछ मिल रहा है तो राजनीति के चतुर खिलाड़ी लालजी टंडन इससे क्यों चूके।

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