मोदी बोले मुझे आशीर्वाद किसी पद के लिये न दें
हरिद्वार। हरिद्वार में स्थित पतंजलि योग पीठ में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर देश को नई दिशा दिखाने के प्रयास किये। हमने मोदी को भारत मां के सपूत कहकर इसलिये संबोधित किया है, क्योंकि मोदी के भाषण के ठीक पहले अभिभावन में उन्हें यही संज्ञा दी गई।
मोदी के भाषण से पहले मोदी ने संस्था के स्कूल का उद्घाटन किया और पुस्तक का विमोचन किया। साथ ही मोदी के लिये दिये गये अभिभाषण में कार्यक्रम संचालक ने कहा कि भारत मां के इस सपूत को देश की बागडोर सौंपने का समय आ गया है। असुरों के साम्राज्य का अंत करने का वक्त आ गया है। देश के हर बेरोजगार युवक को मोदी में एक महीहा दिखाई देता है। 125 करोड़ भारतवासियों को आपसे बहुत अपेक्षाएं हैं।

देश के करोड़ों लोगों का प्यार वंश परंपरा या राजनीतिक डोर से नहीं मिला है। यह आपकी मेहनत ही है, जो लोग आपको इतना प्रेम करते हैं। आपके द्वारा राष्ट्र का नवनिर्माण हो, भारत पुन: विश्व की पुन: आध्यात्म एवं शक्ति बने, देश को सामाजिक न्याय मिले, राष्ट्र से अन्याय समाप्त हो, ऐसी शुभकामनाओं सहित आपको यह अभिनंदन पत्र प्रेषित कर रहे हैं।
नरेंद्र मोदी का भाषण-
महापुरुषों के बीच खड़े होकर कुछ कहने की नौबत आये, तो कहने वाले का हाल कैसा होगा आप भलिभांति समझ सकते हैं। ईश्वर ने जबसे मुझे दुनिया को जानने समझने का अवसर दिया, तब से जितने भी कुंभ के मेले हुए, उन सबमें मैं उपस्थित था। और कभी यह भी सौभाग्य मिला था, कि पूरे समय मैं कुंभ मेले में रहा। लेकिन इस बार का पहला कुंभ का मेला ऐसा था, जिसमें मैं पहुंच नहीं पाया। मन में एक कसक एक पीड़ा थी। उसी कसक के साथ मैं आया था और आज यह अवसर मिला, तो वो कसक मिट सी गई है।
हमारे देश में किसी के लिये कुछ भी कह देना, यह एक स्वभाव सा बन गया है लोगों का। इसलिये पता नहीं किस-किस के लिये क्या-क्या कहा गया। मैं मीडिया वाले मित्रों की हाजरी में कहना चाहूंगा कि गुजरात में किसी ने मुख्यमंत्री के पास आकर के कभी किसी ने कोई मांग नहीं की। इसलिये मैं आज जिम्मेदारी के साथ, कहना चाहता हूं, कि मेरे बारह साल के कार्यकाल में मुझे एक भी संत महात्मा ऐसा नहीं मिला, जिसने सरकार से कुछ मांगा हो।
संतों की शक्ति
संतों की शक्ति ऐसे ऐनक का निर्माण करें, कि ऐसे लोगों को कुछ दिखाई दे। और उस अर्थ में उनकी वाणी का सामर्थ, हजारों गुना बढ़ जाता है। उन्होंने जो मर्यादा रेखाएं तय की होती हैं, उस मर्यादा रेखा के बाहर जाने का साहस कोई नहीं कर पाता है, क्योंकि यह उनकी साधना की वजह से ऐसा होता है। मैं बाबा रामदेव को सालों से जानता हूं, जब वो साईकिल पर घूमते थे और छोटी सी पुडि़या से निकाल कर काजू देते थे, वो भी याद है।
आप कल्पना कर सकते हैं, कि प्रति दिन डेढ़-दो लाख लोगों को स्वस्थ्य रहने के लिये प्रेरित करते रहें। ऐसा व्यक्ति शायद ही कोई होगा। अगर बाबा रामदेव जैसे लोग दुनिया के किसी और देश में होते, तो न जाने कितने विश्वविद्यालयों ने उन पर पीएचडी कर डाली होती। मैं गीनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड वालों से कहना चाहता हूं, कि क्या आपने कभी इस रिकॉर्ड पर ध्यान दिया। टीवी, रेडियो के माध्यम से नहीं बल्कि रूबरू होकर लोगों से बात की होगी, ऐसा रिकॉर्ड दुनिया में कहीं नहीं। यह हमारा दुर्भाग्य है, कि हम लोग हमारे देश के सामर्थ की चर्चा कभी करते ही नहीं।
भारत को जगत गुरु बनाना है
आप ने कभी कल्पना की है, कि कुंभ मेले में किनते संतों-महात्माओं के डेरे बस जाते हैं। वहां करोड़ों लोग आते हैं और दो-दो तीन-तीन महीने तक बिना किसी आमंत्रण के करोड़ों लोग पहुंचते हैं। न कभी हत्या न कभी लूटपाट और न कभी झगड़ा। क्या किसी मैनेजमैंट गुरु ने सोचा है कि ऐसा कैसे संभव हुआ। हमें अपने सामर्थ का परिचय करने की आदत खत्म हो गई है। मैं भी एक हिन्दुस्तान के छोटे बच्चे होने के नाते, उन महापुरुषों का अभिनंदन करता हूं।
श्री अरविंद ने कहा था कि मुझे विश्वास है कि मेरी भारत माता, आजाद तो होगी, साथ में विश्व कल्याणक होगी। स्वामी विवेकानंद के सपनों को कौन पूरा करेगा। क्या इस देश के एक-एक बच्चे का दायित्व नहीं है, कि जिस स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मेरी भारत माता जगत गुरु के स्वामिव में विराजमान है।
पूरा विश्व यह मानता है कि यह ज्ञान की सदी है। जब-जब मानव जाति ने ज्ञान में प्रवेश किया है, तो भारत ने ही उसका नेतृत्व किया। उस दिशा में हमें नागरिक होने के नाते, हम जहां भी हों, जैसे भी हों, उस कर्तव्य का पालन करने के लिये तत्पर रहना चाहिये।
अभी-अभी नवरा्त्रि का पर्व संपन्न हुआ। दुनिया कहती है कि लोग कहते हैं कि मोदी कितनी प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन क्या कहें, खैर मेरी इच्छा होती थी, कि मां काली के दर्शन करूं, बेलूर मठ में जाऊं। हाल ही में मैं मां काली के और बेलूर मठ गया और संतों के बीच गया। बाद में सूचना आयी कि केरल से सूचना आयी और वहां नारायण गुरु की भूमि के दर्शन का निमंत्रण आया।
बाबा रामदेव और मैं सगे भाई
मैं जब छोटा था, तब कई सवाल किये जाते थे, हमें भ्रमित किया जाता था। मुझे लगता है कि बाबा रामदेव देश को कपाल भांति की ओर खीच ले गये, लेकिन जिन लोगों के कपाल में भ्रांतियां हैं, वो अलग-थलग पड़ जाते हैं। मुझे विश्वास है कि एक दिन यही कपाल भांति सभी भ्रांतियों को मिटायेगी। जब मैं छोटा था, तब एक साधारण परिवार से था। मैंने कभी कार तक नहीं देखी थी। तब मैं कुछ नहीं करता था, तो लोग कहते थे, कुछ करते क्यों नहीं, आज जब कुछ करता हूं, तो लोग कहते हैं आप क्यों कर रहे हैं। मैं बाबा रामदेव के लिये कहना चाहूंगा कि उन्होंने बिना स्वार्थ देश की सेवा की। हरिद्वार में किसी की जेब में अगर पैसा नहीं हो तो वो यहां भूखा नहीं रह सकता। उन्हें खिलाने वाले कौन हैं? यही संत हैं, जो उन्हें खाये बगैर जाने नहीं देते। उन्हीं संतों के लिये कोई सोचता तक नहीं।
मैंने बाबा रामदेव से पूछा कि चारों तरफ से जब यातनाएं आती हैं, तो कैसे झेलते हैं। क्या नहीं बीती उन पर? आपको जो नहीं पसंद है वह बोलना क्या गुनाह है? बाबा पर जो गुजरी उसके लिये मैं एक सवाल पूछ रहा हूं। यह सवाल मोदी नहीं, देश पूछ रहा है कि देश की भलाई के लिये जुल्म सहने वाली माता राज बाला पूछ रही हैं, दिल्ली में बैठे शासकों ने क्यों जुल्म ढहाये। कुछ लोगों को लगता था, दबंग के दौर से दुनिया को दबोच सकते हैं। लोग कान खोल कर सुन लें, अंग्रेजी हुकूमत किसी को दबोच नहीं पायीं, तो आप लोग क्या हैं। आप लोग चीज क्या हैं, एक बार निकलो तो सही। जनता को जवाब नहीं दे पाओगे।
बाबा रामदेव ने देश का भ्रमण किया और देखा कि देश किन परिस्थितियों से जूझ रहा है। तब वो देश के लिये खड़े हुए। रामदेव कहते हैं, हम दोनों सगे भाई हैं। क्योंकि जितने जुल्म मेरे ऊपर हुए उतने आप पर भी होते हैं। मैं सूची बनाता हूं कि बाबा पर जितने जुल्म हुए तो मेरी बारी कब आयेगी। क्या शासन का यही काम है। आप बीमारियों की दवाएं खोज रहे हैं, और ये संत बीमारी को जड़ से मिटाने के उपाये बता रहे हैं, लेकिन आप को समझ नहीं रहे। इनकी बात को नकारने से काम नहीं चलेगा।
1947 में पैदा नहीं हुआ भारत
एक वर्ग यह मानता है कि हिन्दुस्तान का जन्म 15वीं सदी में हुआ, जो लोग यह मानते हैं कि हिन्दुस्तान का जन्म 1947 में हुआ, वो लोग गलत राह पर चल रहे हैं। इतिहास वही समाज बना सकता है, जो इतिहास में से प्राण शक्ति निकाल सकता है। खुद को इतिहास से अलग करने के प्रयास करते हैं। शास्त्रों की विरासत को हम पुराणपंथी कहकर उसे गाली देते हैं। तब जाकर स्वस्थ्य समाज के निर्माण में रुकावटें आती हैं। ज्वाइंट फैमिली खम हो रही हैं, हम माइक्रो फैमिली की ओर बढ़ चुके हैं, बच्चे आया के भरोसे पल रहे हैं। याद की जिये हमारी समाज व्यवस्था क्या थी। जो निकम्मी व्यवस्था है उसे उखाड़ फेंकिये।
मैं कहना चाहता हूं कि हम ही लोग इतने भाग्यशाली हैं कि हमारा समाज इतना जागृत है, कि जिस कारण जब जब कमियां आयीं, तब तब इसी समाज से तेजस्वी महापुरुषों ने जन्म लिया। जब अस्पृश्यता की बात चल रही थी, तब गांधी आये और सबको एक समान कहा। जब हम पूजा-पाठ कर रहे थे, तब स्वामी विवेकानंद आये और उन्होंने कहा भगवान की नहीं भारत मां की पूजा करो। अब सारी शक्तियों को एक करके आगे बढ़ने का समय है। ऐसा करने पर भारत मां को जगत गुरु बनने से कोई नहीं रोक पायेगा।
गुजरात में 12 साल से दंगे नहीं हुए
मैं आशावादी व्यक्ति हूं, विश्वास मेरी रगों में दौड़ता है, मेरा पसीना विकास मंत्र से पुलकित होता है। गुजरात के अनुभवों से कहता हूं, कि निराश होने का कोई कारण नहीं। जब गुजरा में भूकंप आया तो सबने कहा गुजरात मौत की चादर में लिपट गया, इसका अध्याय समाप्त हो गया। गुजरात के लिये अच्छा चाहने वाले भी दुखी थे। उसी गुजरात ने दिखा दिया। सारा विश्व कहता है, विश्व बैंक कहता है भयानक भूकंप से उबरने में समृद्ध देशों को भी 7 साल लगते हैं। लेकिन गुजरात 3 साल के भीतर दौड़ने लगा। आज जो विश्व भर में गुजरात के विकास की चर्चा हो रही है, संतोष का जो भाव उत्पन्न हो रहा है। उसका कारण नरेंद्र मोदी नहीं हैं, नहीं हैं, नहीं हैं, उसके कारण सिर्फ छह करोड़ गुजराती हैं। उन्हीं का पुरुषार्थ है।
कुछ लोग हमारे इरादों पर शक करते हैं। मैं उन सबको कहना चाहता हूं, मैं उन संस्कारों में पला हूं, जो कहता है सर्वे सुखिना संतु... सबके कल्याण की बात हम करते हैं। हमारे पूर्वजों ने यही मैनीफेस्टो दिया है।
2002 में जब मैं चुनाव जीता था, तब कई लोग बेहोश हो गये थे, वो आज तक बेहोश हैं। तब मैंने कहा था अब चुनाव समाप्त हो चुके हैं, तूतू मैं मैं का दौर खत्म हो चुका है, हम सबको मिलकर गुजरात को आगे बढ़ाना है। मैंने कहा था जिन्होंने हमें वोट दिया, वो भी मेरे हैं, जिन्होंने मुझे वोट नही दिया और या किसी को वोट नहीं दिया, वो भी मेरे हैं। इन संतों की शिक्षा दीक्षा रही है, कि उस माहौल में मैंने कहा था, अभयम। 12 साल हो गये हैं। लोग गुजरात में आये दिन निर्वस्त्र होकर मौत के घाट उतार दिया जाता है। आज दंगों का नामों निशान नहीं बचा है।
मुझे आशीर्वाद किसी पद के लिये नहीं चाहिये
आज मुझे एक सम्मान पत्र दिया गया। मैं अपने आप से पूछता हूं, क्या मैं इसके योग्य हूं। मेरी आत्मा कहती है, मैं इसके लिये कतई योग्य नहीं हूं। लेकिन संत मन से मां के रूप होते हैं। संतों के भीतर एक मां का विराट रूप स्थित होता है। जो संतों के करीब जाता है, उसे ही यह महसूस होता है। मुझे लगता है मेरी दौड़ कुछ कम पड़ रही है। मुझे लगता है, अभी भी मुझे कुछ कमियां हैं। और संतों ने आज एक अलग ढंग से इंगित किया है। बेटे ये सब तुम्हें अभी पूरा करना बाकी है। यह सम्मान पत्र नहीं, यह आदेश पत्र है। मेरे लिये यह प्रेरणा पुष्प है। यह मुझे हर पल कमियों से मुक्ति देने की ताकत दे। मैं संतों से खुले आम कहता हूं, कि मुझे संतों से आशीर्वाद नहीं चाहिये, जो किसी पद के लिये हो। हम उसके लिये पैदा नहीं हए। मुझे संतों से आशीर्वाद चाहिये कि मैं कभी कुछ गलत न करूं। मेरे हाथों से कुछ गलत नहीं हो जाये। मेरे हाथों से किसी का बुरा न हो जाये। संत मुझे वो आशीर्वाद दें। गंगा मैया मुझे वो सामर्थ दें। आप सब जनताजनार्दन ईश्वर का रूप होता है। मैं ईश्वर के चरणों में नमन करता हूं और साथ ही 125 नागरिकों की तरह हम भी कभी भी किसी का बुरा नहीं करें, किसी के लिये बुरा नहीं सोचें, जो महान कार्यों के लिये यज्ञ चल रहे हैं। वो सफल हों। हम सब मिलकर स्वामी विवेकानंद के सपनों को पूरा करें।
मैं इसी मनोकामना के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूं। भारत माता की जय।












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