आम भाजपायी मोदी को मान चुके हैं पीएम कैंडिडेट

[नवीन निगम] भारतीय जनता पार्टी के आलाकमान या वरिष्‍ठ नेता पीएम कैंडिडेट को लेकर भले ही अभी असमंजस में पड़े हुए हों, लेकिन आम कार्यकर्ताओं ने गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नेता चुन लिया है। खास बात यह है कि आलाकमान अब उन्‍हें नाराज तक नहीं कर सकती है। अगर इतिहास के पन्‍ने पलटें तो आप भी समझ जायेंगे कि अब मोदी के सिवाये पार्टी में कोई और पीएम पद का दावेदार हो ही नहीं सकता।

इतिहास के पन्‍ने- याद करिए 1987 से 1989 के बीच की भारतीय राजनीति को। यह वो समय था जब वीपी सिंह ने राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप में दलाली खाने का आरोप लगाया था। वीपी सिंह कांग्रेस पार्टी के बाहर आ गए थे 1984 के चुनावों में कांग्रेस के हाथों बुरी तरह पराजित विपक्ष 1987 के बाद इस प्रकार उठा कि उसने 1989 के चुनावों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया।

Narendra Modi

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि विपक्ष के पास वो नेता था जो भीड़ को वोट में बदल देता था। वीपी सिंह की छवि के चलते नई पार्टी जनता दल ने उत्तर भारत में कांग्रेस को बुरी तरह पराजित किया। भाजपा भी इसी मौके के बीच ऊभर कर आगे आई थी। 1977 में जेपी और 1989 में वीपी सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष को बड़ी जीत दिलाई। यानी कांग्रेस तब-तब हारी जब विपक्ष (अब एनडीए) को कोई जोरदार नेता मिला। 1997-99 में भी भाजपा इसलिए सबसे आगे रही क्योंकि उसके पास अटल के रूप में ऐसा नेता था जो भीड़ को वोट में बदल देता था।

इसी इतिहास को लेकर यदि चला जाए तो लालकृष्ण आडवाणी हो या सुषमा स्वराज यह पिछले चुनाव में भी नेता थे जब भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। भाजपा में आम कार्यकर्ता इसलिए उत्साहित है क्योंकि वह नरेंद्र मोदी को अपना नेता मानकर चल रहा हैं वही नरेंद्र मोदी जिन्होंने गुजरात में कांग्रेस को तीन बार धूल चटाई। पुराने जमाने में भी बड़ी सेनाए जब किसी बड़े विजय अभियान पर निकलती थी तब सेनापति उसे ही बनाया जाता था जो पिछली कई जंग उस सेना से जीत चुका होता था क्योंकि ऐसा व्यक्ति ही सेना में जोश भर सकता था।

नरेंद्र मोदी इस समय उत्तर भारत में भाजपा कार्यकर्ताओं का पहली पसंद इसीलिए है क्योंकि वह लगातार कांग्रेस के खिलाफ जीतते आ रहे हैं और ऐसे में कार्यकर्ताओं को लगता है कि वह भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के खिलाफ जीत दिलाएंगे और उनमें भीड़ को वोट में बदल देने की क्षमता हैं। इसलिए भाजपा में पीएम पद का प्रत्याशी वही बनेगा जिसे आम कार्यकर्ता चाहेगा और भाजपा का आम कार्यकर्ता तो मोदी के नाम पर अपनी सहमति दे चुका है। यदि भाजपा नेताओं ने कार्यकर्ताओं पर जबरदस्ती नेता थोपा तो कार्यकर्ता की नाराजगी भाजपा को ले डूबेगी।

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