गर्मी में प्यास से छटपटायेगा छत्तीसगढ़
रायपुर। छत्तीसगढ़ में भूमिगत जल सूखता जा रहा है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 20 ब्लॉक में स्थिति बेहद गंभीर हो गई है। पांच साल पहले यह स्थिति केवल छह ब्लॉक में थी। इसके अलावा लगभग 10 ब्लॉक में भू-जल का दोहन कहीं अधिक हो रहा है। वहां भी स्थिति के गंभीर होने का अंदेशा व्यक्त किया जा रहा है।
बोर्ड ने इन इलाकों में जलसंचय का सुझाव दिया है। बेमेतरा जिला पहले ही खारे पानी की समस्या से जूझ रहा है। यहां के कुछ गांव में आज भी लोग पांच से 10 किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाते हैं। केंद्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के अधीन केंद्रीय भूमि जल बोर्ड छत्तीसगढ़ में भू-जल स्तर की लगातार निगरानी कर रहा है। बोर्ड से जारी कुछ रिपोर्ट पर गौर करें तो पाते हैं कि प्रदेश में भू-जल दोहन की दर 20.43 प्रतिशत है।

कुछ जिलों में यह दर औसत से काफी अधिक है। इस वजह से उन जिलों में भू-जल स्तर गिरता जा रहा है। बोर्ड के अधिकारियों का हालांकि कहना है कि प्रदेश में भू-संरचना इस तरह है कि बारिश के दिनों में भू-जल अपने आप ही रिचार्ज हो जाता है, लेकिन सेमी क्रिटिकल क्षेत्रों में दोहन अधिक होने के कारण भू-जल स्तर फिर से गिर जाता है।
प्रदेश में सबसे ज्यादा भू-जल का दोहन दुर्ग जिले में हो रहा है। वहां भू-जल विकास दर 68.81 प्रतिशत है। जिले के दुर्ग, धमधा, और पाटन ब्लाक में कृत्रिम पुनर्भरण के साथ भू-जल दोहन करना सही होगा। वर्षभर पहले दुर्ग से विभाजित बने बालोद जिले के बालोद, गुंडरदेही, गुरुर और बेमेतरा जिले के बेमेतरा, साजा और बेरला ब्लॉक भी इसी गंभीर क्षेत्र में आता है। धमतरी जिले में भू-जल की विकास दर 67.39 प्रतिशत है।
धमतरी और कुरुद ब्लॉक में स्थिति बेहद गंभीर है। इसी तरह कवर्धा और राजनांदगांव जिले की भी स्थिति है। इन दोनों जिलों के पंडरिया, राजनांदगांव और बरमकेला ब्लॉक सेमी क्रिटिकल जोन में आते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, जगदलपुर, भोपालपट्नम, दोरनापाल, जैजैपुर, मालखरौदा, कोरबा, कटघोरा, रायपुर (धरसीवां), आरंग, जशपुर और अंबिकापुर में भू-जल का दोहन अधिक हो रहा है। वहां कुछ समय बाद स्थिति और गंभीर हो सकती है। इसलिए समय रहते बरसात का पानी रोकने और भूजल दोहन कम करना नितांत जरूरी हो गया है।
पीने लायक नहीं पानी :
राज्य के कई इलाके ऐसे भी हैं, जहां भू-जल में हानिकारक तत्व घुले हुए हैं। ये मानक स्तर से काफी अधिक हैं। इससे वहां के लोग लगातार बीमार हो रहे हैं। पानी में सबसे ज्यादा लौह तत्व घुले हुए हैं। बस्तर जिले के दहीकोंगा, दरभा, कोंडागांव, गारका, दंतेवाड़ा के रोंजे, बास्तानार, बचेली सहित सरायपाली, पिथौरा, बोड़ला, मुरवेंडी, सोनगरा, प्रतापपुर, राजपुर, अंतागढ़, मनेंद्रगढ़ के भू-जल में लौह तत्व पाए गए हैं।
वहीं बीजापुर, भोपालपटनम, तखतपुर, नवागढ़ और बेमेतरा ब्लाक के भू-जल में सल्फेट मिला है। भू-जल में फ्लोराइड की मात्रा नगरी, कटघोरा, छुरिया (चांदी डोंगरी) और तमनार में अधिक है। रामानुजगंज के ताता पानी इलाके में सल्फर की मात्रा अधिक है। कोरबा जिले में उद्योगों के कारण भू-जल प्रदूषित हो गया है। जैजैपुर, मालखरौदा और साजा क्षेत्र में भू-जल अत्यधिक खारा है। अंबागढ़-चौकी के 11 गांवों में आर्सेनिक की मात्रा मानक से काफी अधिक है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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