मुलायम ने पार्टी जिलाध्यक्षों की हैसियत बढ़ाई, विपक्ष ने की निंदा

सपा के जिलाध्यक्ष अब सरकार के मंत्रियों से लेकर अफसरों तक के रिपोर्ट कार्ड तैयार करेंगे। वे मुख्यमंत्री को बताएंगे कि किन मंत्रियों की कैसी साख है तथा किस अफसर का कामकाज अच्छा है और किसका खराब है। यही नहीं, अफसरों के पदस्थापन और तबादले में भी जिलाध्यक्षों की सिफारिश को तवज्जो दी जाएगी और उनके शिकायती पत्रों पर त्वरित कार्रवाई होगी।
दरअसल, पार्टी संगठन में जिला स्तर के नेता इधर कुछ समय से राज्य सरकार की कार्यशैली और मंत्रियों द्वारा की जा रही उपेक्षा की शिकायतें कर रहे थे। विगत तीन अप्रैल को मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी में पार्टी के सभी जिला अध्यक्षों के साथ बंद कमरे में बैठक की थी, जिसमें उन्हें अधिकार दिए जाने का आश्वासन दिया था।
सूत्रों का मानना है कि पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह ने आगामी लोकसभा चुनाव में जिला स्तर के पार्टी नेताओं की अहमियत को समझते हुए यह कदम उठाया है। सपा नेतृत्व का लक्ष्य केंद्र की राजनीति में सपा की दखल बढ़ाने का है, ताकि अगली सरकार के गठन में इस पार्टी की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा सके। यही वजह है कि मुलायम जमीनी स्तर के नेताओं को असंतुष्ट रखना नहीं चाहते।
सपा की उत्तर प्रदेश इकाई के एक नेता ने आईएएनएस कहा, "लोकसभा चुनाव सिर पर है। कुछ जिलों को छोड़कर लगभग सभी स्थानों पर उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं। इस स्थिति में अगर पार्टी संगठन में नाराजगी रही तो चुनाव में पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए पार्टी नेतृत्व उनकी प्राथमिकताओं को लेकर अत्यंत गंभीर है। "
उधर, विपक्षी दलों ने सपा प्रमुख के इस कदम को सियासी फायदे के लिए उठाया गया कदम बताते हुए इसकी आलोचना की है। उनका कहना है कि सपा के इस अंसवैधिनक कदम का जनता चुनाव में करारा जवाब देगी। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की वरिष्ठ नेता रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं कि चुनावी फायदे को ध्यान में रखकर लोकसभा चुनाव से पहले उठाया गया सपा का यह कदम जनविरोधी और संविधान की मूल भावना के विपरीत है। इससे सत्तारूढ़ दल के नेताओं की निरंकुशता एवं अधिकारियों में हताशा बढ़ेगी।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता हृदय नारायण दीक्षित कहते हैं, "सपा प्रमुख उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव में भी पार्टी के करिश्माई प्रदर्शन उम्मीद कर रहे थे, लेकिन सरकार के एक साल के कामकाज के बाद जो परिस्थितियां बनी हैं, उससे अब उन्हें ऐसा होता नहीं दिख रहा है। इसीलिए उन्होंने संगठन को संतुष्ट करने का प्रयास किया है, मगर यह कदम असंवैधानिक है।"(आईएएनएस)












Click it and Unblock the Notifications