मुलायम सिंह न कभी अच्छे दोस्त बने न दुश्मन

इस समय मुलायम सिंह यादव कथित तौर पर कांग्रेस के सबसे अच्छे मित्र हैं। लेकिन मजेदार बात यह है कि वो कांग्रेस को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने अगले कार्यकाल की मंशा क्या जता दी, मुलायम ने पकड़ कर उनकी टांग खींच ली। कांग्रेस के किसी भी प्रस्ताव की बात आती है तो मुलायम विरोध करने में जरा भी पीछे नहीं हटते।
वहीं दुश्मनी की बात करें तो वे खुद को भातरीय जनता पार्टी के धुर विरोधी बताते हैं, लेकिन रह-रह कर लाल कृष्ण आडवाणी की बढ़ाई उनके अंदर भाजपा के लिये प्रेम दर्शाती है। यानी इस समय मुलायम भाजपा से दुश्मनी भी नहीं निभा पा रहे हैं।
अगर किसी व्यक्ति विशेष से दोस्ती दुश्मनी की बात करें तो मुलायम की न तो मायावती से बनी और न हीं अमर सिंह से। सच पूछिए तो उन्होंने किसी व्यक्ति से ठीक ढंग से दुश्मनी भी मोल नहीं ली। खैर ये तो अच्छी बात है, दुश्मनी में आखिर रखा ही क्या है।
कांग्रेस से लेकर तीसरे मोर्चे तक पर मुलायम के बयानों से स्पष्ट नजर आ रहा है कि वो खुद अभी तक तय नहीं कर पाये हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद किसका दामन थामें। एक तरफ कांग्रेस बाहें फैलाये खड़ी है, तो दूसरी तरफ दीदी और बहन मायावती से मजबूरन दोस्ती करने की परिस्थितियां बनती दिख रही हैं। भाजपा फिलहाल तो सेफसाइड चल रही है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि जिस दिन नीतीश कुमार ने एनडीए को बाय-बाय बोल दिया, उस दिन मुलायम के लिये एनडीए के सारे दरवाजे खुल जायेंगे।
इसमें भी कोई दो राय नहीं कि मुलायम चाहे किसी के दोस्त बन पायें या नहीं, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद किंगमेकर जरूर बनकर उभरेंगे, क्योंकि उत्तर प्रदेश में उन्हें अच्छी संख्या में सीटें मिलने के पूरे आसार हैं। यूपी में पहले लैपटॉप, फिर अल्पसंख्यकों के लिये योजनाएं, किसानों को ऋण आदि के बाद अब किसानों को मुफ्त साइकिल और प्रेशर कुकर उनके वोट को पक्कर करते दिखाई दे रहे हैं।












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