अफजल की फांसी पर जम्मू व कश्मीर के बीच गहरी 'खाई'

उत्तरी कश्मीर के सोपोर जिले के अफजल गुरु को वर्ष 2001 में संसद पर हुए आतंकवादी हमला मामले में दोषी ठहराया गया था। 9 फरवरी को उसे तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई और उसके शव को जेल में ही दफन कर दिया गया। फांसी पर चर्चा के लिए पीडीपी ने स्थगन प्रस्ताव पेश किया। पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने पूछा, "फांसी की सजा पाए लोगों में 28वें नंबर पर स्थित अफजल गुरु को आखिर क्यों चुनकर फंदे पर लटका दिया गया और उसे सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अवसर भी नहीं दिया गया?"
कश्मीर घाटी में यही सवाल कई लोग दोहरा रहे हैं, लेकिन जम्मू में यह सवाल कोई मायने नहीं रखता। उनके लिए अफजल एक आतंकवादी था और वह फांसी का ही हकदार था। विधानसभा अध्यक्ष ने स्थगन प्रस्ताव उठाने की अनुमति दी। उस समय इस मांग के समर्थकों में सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस और घाटी से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के एक मात्र विधायक ने भी समर्थन किया। जम्मू की राजनीति में दखल रखने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जम्मू कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी (जेकेएनपीपी) और जम्मू मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के एक स्वतंत्र विधायक ने इसका विरोध किया।
विरोध करने वालों ने गुरु को आतंकवादी बताया और कहा कि उसने संसद पर हमले का साजिश रची थी। सदन में स्थगन प्रस्ताव मंजूर होने के बाद जम्मू और कश्मीर केंद्रित पार्टियों के बीच जुबानी जंग शुरू हो गई। कांग्रेस जिसका जनाधार जम्मू और कश्मीर घाटी दोनों ही तरफ है इस कदम के खिलाफ थी, लेकिन राजनीतिक गठबंधन की मजबूरी ने उसकी जुबान पर ताला जड़ रखा था। बहस के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पार्टी सहयोगियों द्वारा अफजल के लिए 'साहिब' संबोधन किए जाने पर भाजपा और जेकेएनपीपी ने कड़ा ऐतराज जताया। जम्मू क्षेत्र से विधायक और राज्य सरकार में मंत्री श्याम लाल शर्मा ने आईएएनएस से कहा, "गुरु के लिए 'साहिब' या 'शहीद' जैसे संबोधन कतई मंजूर नहीं। भारत के खिलाफ बयान देने वाले सदस्य को निलंबित किया जाना चाहिए।" (आईएएनएस)












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