मोदी के लिये बेचैनी है मुसलमानों का मृगजल
यह उस समय की बात है जब नरेंद्र मोदी के खिलाफ आवाजें बुलंद थीं। हां गुजरात दंगों के बाद आज गोधरा कांड की 11वीं बरसी है। दुर्भाग्यवश भविष्य की ओर बढ़ते वक्त उन पीडि़तों के करहाने की आज भी कान में गूंजती है। अगर मोदी की उपलब्धियों की तरफ देखें तो विकास दो भागों में बंट गया है- धर्मनिर्पेक्ष और सांप्रदायिक।
कोई भी अगर मोदी के गुजरात के बारे में तर्कसंगत बात करता है तो लोग कहते हैं उपदेश दे रहा है। और एक प्रजाति ऐसी है, जिसने भारतीय मुस्लिमों के बीच एक डर सा पैदा कर दिया है। एक झूठा वातावरण बना दिया है मोदी के खिलाफ। असल में मोदी के बारे में बात होती है तो एक मृगजल ही मुसलमानों को दिखाई देता है, जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं है। यही कारण है कि गुजरात के मुख्यमंत्री के लिये वो बेचैनी का कारण बनी हुई है।
उस मृगजल का निर्माण विकृत तथ्यों के आधार पर किया गया। एक स्प्रिंग बोर्ड का इस्तेमाल कर गोधरा दंगों के बाद उन्हें उछाला गया। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। फर्स्ट हैंड डेवलपमेंट, बेहतरीन शासन और सुविधाएं प्राप्त करने के बाद तमाम मुस्लिम हैं गुजरात में जो उन बातों को भूल चुके हैं।
एक सवाल यह उठता है कि कौन और क्या है जो भारतीय मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करते हैं? किराये के ट्टू, जो आज हमारे साथ तो कल किसी और के साथ। इसमें आप उन गैर सरकारी संगठनों का नाम ले सकते हैं, जिनकी खुद की भूमिका संदिग्ध है। नेताओं की बात करें तो वो मुस्लिम वोट पाने के लिये कुछ भी कर सकते हैं।
सच तो यह है कि भारत में मुसलमानों के पास उनकी जनसंख्या से ज्यादा प्रतिनिधि हैं! लेकिन भारतीय मुस्लिम समुदाय को कौन परिभाषित करता है यह जानना जरूरी है। उत्तर है महत्वकांक्षा। अन्य समुदायों की तरह ही। भारतीय मुसलमानों की भी ढेर सारी महत्वकांक्षाएं हैं, सपने हैं और उम्मीदें भी। लेकिन उन आकांक्षाओं को पीडि़त बताकर दबा दिया जाता है। महत्वकांक्षा है अच्छी शिक्षा की, महत्वकांक्षा है नौकरी की, महत्वकांक्षा है बिजनेस की और कई अन्य। और ये सभी महत्वकांक्षाएं वोटबैंक पर आकर रुक जाती हैं।
65 साल के बाद भी कई वादे अधूरे हैं। कांग्रेस दावा करती है कि वो मुस्लिमों के हित के लिये काम करती है। लोग कहते हैं कि मुस्लिम वोट सिर्फ कांग्रेस के खाते में ही गिरता है। लेकिन गुजरात विधानसभा और निकाय चुनावों में सब बातें धरी की धरी रह गईं, जब मुस्लिम बहुल्य इलाकों में मोदी के प्रत्याशी जीत कर आये। 2012 के विधानसभा चुनावों में 66 सीटों, जहां मुस्लिम आबादी 10 फीसदी थी में से 40 भाजपा को मिलीं। जहां ममुस्लिम आबादी 15 फीसदी थी, वहां की 34 में से 21 सीटें भाजपा ने जीतीं। जहां मुस्लिम आबादी 20 से 61 फीसदी तक थी वहां भाजपा ने 9 सीटें जीतीं।
जमालपुर खडि़या, वेजलपुर, भरुच, सूरत ईस्ट, वग्रा और भुज जैसी जगहों पर भाजपा की जीत साफ दर्शाती है कि गुजरात के मुसलमानों को अब विकास चाहिये। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि गुजरात के मुसलमान देश में सबसे तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। देश में जहां मुसलमानों की साक्षरता दर 59.1 प्रतिशत है, वहीं गुजरात के 73.5 प्रतिशत मुसलमान पढ़े लिखे हैं। इतना अधिक प्रतिशत तो शहरी भारत में (70 फीसदी) भी नहीं है। इसी प्रकार ग्रामीण इलाकों की बात करें तो गुजरात के 69 फीसदी मुसलमान साक्षर हैं, जबकि देश के ग्रामीण इलाकों मं 53 फीसदी मुसलमान ही साक्षर हैं।
आर्थिक स्थिति की बात करें तो गुजरात के मुसलमानों की आर्थिक स्थित भारत के अन्य राज्यों के मुसलमानों से कही अधिक है। इस मामले में गुजरात ने सभी राज्यों को पछाड़ दिया है। प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो गुजरात के मुसलमानों की 875 रुपए है, जबकि देश में औसत 804 रुपए है। यह सभी बातें साफ दर्शाती हैं कि मोदी का विकास किसी एक वर्ग या समुदाय के लिये नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के लिये है। अंत में मोदी का एक वादा जरूर दोहराना चाहूंगा सब साथ, सब विकास!













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