गोधरा कांड की बरसी: राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी में फर्क क्यों?

यह बात ओर है कि गुजरात अक्सर कड़वी यादों को भुला कर आगे बढ़ने में विश्वास रखता है, परंतु राजनीति एक ऐसी बला है, जो समय-समय पर इस जड़ को पनपने के लिए हवा-पानी देने की कोशिश करती है। फैजाबाद से अहमदाबाद के लिए साबरमती एक्स्प्रेस ट्रेन अपने निर्धारित समय के अनुसार हमेशा की तरह 27 फरवरी, 2002 की उस सुबह भी तेजी से अहमदाबाद की ओर बढ़ रही थी। ट्रेन में हजारों यात्री थे और इन्हीं यात्रियों में वो कारसेवक भी थे, जो अयोध्या में राम मंदिर परिसर में कारसेवा करके अहमदाबाद लौट रहे थे।
ये कारसेवक इस ट्रेन के एस-6 डिब्बे में बैठे हुए थे, तभी गोधरा के पास सिग्नल फळिया इलाके में एस-6 डिब्बा आग से घिर गया और उसमें 59 कारसेवक मारे गए। इसे ही कहते हैं गोधरा कांड। उसके बाद जो हुआ, वो पूरा गुजरात और जो नहीं भी हुआ, वो भी पूरा देश जानता है। यह विवाद का विषय अब भी है कि गोधरा कांड था या
गोधरा हादसा?
आज इस मुद्दे पर चर्चा छेड़ना इसलिए लाजिमी लगता है, क्योंकि आज उस घटना को 11 साल हो गए। 27 फरवरी, 2002 की सुबह हो हुआ, उसने गुजरात को एक नया अध्याय दिया। अगले चार दिनों तक यानी 28 फरवरी, 1, 2 व 3 मार्च तक गुजरात भीषण दंगों की आग में झुलसता रहा।
लेकिन आज यहाँ चर्चा का विषय आफ्टर गोधरा नहीं, बल्कि बिफोर गोधरा है। गोधरा कांड के बाद क्या हुआ? कैसे हुआ? कितना हुआ? इस बारे में तो बहसें ग्यारह वर्षों से हो रही हैं, लेकिन इन सवालों के जिस प्रकार के राजनीतिक जवाब आते रहे और जिस तरह एक व्यक्ति विशेष-एक समूह विशेष को निशाना बनाया गया, उसी के चलते बिफोर गोधरा पर सोचने के लिए यह विवशता पैदा हुई है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या गोधरा कांड से पहले इस देश में ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं, जिसके बाद इतनी बड़ी प्रतिक्रिया हुई हो? वैसे इस प्रश्न का एक बड़ा जवाब है 1984 के सिख विरोधी दंगे। किसी भी भाजपा नेता के पास गोधरा कांड के जवाब में सिख विरोधी दंगा ही होगा, लेकिन क्या दिल्ली और पंजाब उसे भूल कर आगे नहीं बढ़े? क्या पूरा देश और स्वयं सिख समाज आज उन दंगों को लेकर किसी हिन्दू या किसी कांग्रेसी नेता विशेष के खिलाफ जहर उगलता है?
शर्मसार हुआ पूरा देश
देश यदि गोधरा कांड के बाद भड़के गुजरात दंगों पर शर्मशार है और उन दंगों को लेकर जिस प्रकार नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार ठहराया जाता है, तो देश के लिए उतने ही दोषी राजीव गांधी को भी मानना चाहिए। लोगं को अच्छी तरह याद होगा कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने क्या कहा था? जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई और दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे, तो राजीव गांधी ने कहा था, ‘‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती ही है।'' हालाँकि इसके जवाब में तत्कालीन विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत संजीदगी से कहा था, ‘‘राजीव अभी बच्चा है, उसे पता नहीं कि जब धरती हिलती है, तभी पेड़ गिरता है।'' अब जरा लगभग 18 साल बाद दिए गए नरेन्द्र मोदी के बयान को देखिए।
गोधरा कांड यानी 27 फरवरी, 2002 को जब साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डिब्बे में आग से 59 कारसेवकों की मृत्यु हुई और गुजरात में भीषण दंगे भड़क उठे, तो नरेन्द्र मोदी ने प्रतिक्रिया दी थी, ‘‘जब कोई क्रिया होती है, तो प्रतिक्रिया भी होती ही है।'' और यह भी याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि वाजपेयी इस दौर में भी सक्रिय थे और उन्होंने उसी संजीदगी से नरेन्द्र मोदी को भी राज धर्म की सीख दी थी।
राजीव गांधी और मोदी का दर्द एक, तो फर्क क्यों
यहाँ चर्चा का विषय वाजपेयी नहीं, बल्कि राजीव गांधी और नरेन्द्र मोदी का दर्द है। क्या राजीव गांधी की प्रतिक्रिया और नरेन्द्र मोदी की प्रतिक्रिया में कोई बहुत बड़ा फर्क है। दोनों ही घटनाओं में निशाना तो अल्पसंख्यक ही बनें। चंद लोगों की करतूत के कारण समाज एक बड़े तबके को भुगतना पड़ा, लेकिन राजनीति के मैदान में राजीव और मोदी के बीच इतना बड़ा फर्क क्यों? क्या लोग नहीं जानते कि नरेन्द्र मोदी तो केवल मुख्यमंत्री थे, जबकि राजीव गांधी ने जब बयान दिया, तब वे देश के प्रधानमंत्री थे। जहाँ तक दंगों की जवाबदेही की बात है, तो सिख विरोधी दंगों के बावजूद भी उस समय देश में रिकॉर्ड बहुमत के साथ कांग्रेस सत्ता में आई थी, तो गुजरात में भी कुछ ऐसा ही हुआ। फिर राजीव और मोदी में भेदभाव क्यों?
देश जहाँ सिख विरोधी दंगों को भुला कर बहुत आगे निकल चुका है और सिख बहुल राज्य पंजाब तक में कांग्रेस उसके बाद कई बार अपनी सरकार बना चुकी है, वहीं गुजरात का मुस्लिम समुदाय भी धीरे-धीरे चुनाव-दर-चुनाव यह संकेत दे चुका है कि वह उन दंगों को भूलना चाहता है और हालिया विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने नरेन्द्र मोदी तथा भाजपा के पक्ष में अच्छी-खासी संख्या में मतदान करके तथा इसी महीने हुए नगर पालिका चुनावों में मुस्लिम बहुल सलाया नगर पालिका में तमाम 27 सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों की जिता कर अपनी इस सोच को पुख्ता करने का सुबूत भी दिया है।
जख्मों को कुरेदते क्यों हैं लोग
इस सारी बहस का सार यही है कि गुजरात जब अपने जख्मों को भूल कर आगे बढ़ चुका है, तो देश के कुछ लोग, कुछ राजनीतिक दल आखिर कब तक नरेन्द्र मोदी को अस्पृश्य बनाए रखेंगे। यह याद दिलाना आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र में आखिरी बहुमत ही सब कुछ होता है और गुजरात मोदी के पक्ष में एक बार नहीं, बल्कि तीन-तीन बार बहुमत दे चुका है, तो देश भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं और उनके दलों और उनकी संकीर्ण वोट बैंक आधारित सोच को धता बता कर नरेन्द्र मोदी के पक्ष में अपना मिजाज बता चुका है। पिछले कुछ सर्वेक्षणों में यह साफ तौर कर उभर कर भी आया कि नरेन्द्र मोदी इस समय देश में प्रधानमंत्री पद के सबसे लोकप्रिय उम्मीदवार हैं।
यदि दंगे ही किसी व्यक्ति के राजनीतिक भविष्य को तय करने के मानदंड हों, तो फिर जो न्याय मोदी के साथ हो रहा है, वही न्याय राजीव के साथ भी होना चाहिए था। राजीव गांधी भी उसी जनता के बूते देश के प्रधानमंत्री बने, जिसका आधार लोकतंत्र है। ऐसे में यदि नरेन्द्र मोदी आज देश के लोकप्रिय नेता हैं, तो फिर गुजरात दंगों को लेकर उन्हें जिम्मेदार ठहरा कर कोसने की राजनीति कहाँ तक उचित है। नरेन्द्र मोदी भी उसी लोकतंत्र का हिस्सा हैं, जिसके राजीव गांधी हिस्सा थे। यदि राजीव गांधी को लोगों ने प्रधानमंत्री बनाया, तो फिर नरेन्द्र मोदी के मामले में गुजरात दंगे किस तरह रोड़े बन सकते हैं।
सिर्फ कांग्रेस पर सवाल नहीं
यहाँ सवालों के घेरे में अकेले कांग्रेस नहीं, बल्कि मोदी के कथित धुरविरोधी नीतिश कुमार भी हैं। ये वही नीतिश कुमार हैं, जो आज तक गोधरा कांड के बाद हुए दंगों को पकड़े बैठे हैं और जब भी मोदी का नाम आता है, राजनीतिक हलकों में नीतिश कुमार का नाम अनायास ही उछल पड़ता है। एक तरफ देश की जनता का मिजाज है, तो दूसरी तरफ नीतिश की वोट बैंक वाली नादानी। नीतिश के बारे में कहा जाता है कि वे यहाँ तक तैयार हैं कि यदि भाजपा ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, तो नीतिश भाजपा का दामन छोड़ कर कांग्रेस का हाथ थामने से भी नहीं चूकेंगे। अब जरा नीतिश से पूछा जाए कि मुद्दा यदि दंगों का और उसकी जवाबदेही का ही है, तो क्या वे सिख विरोधी दंगों के लिए कांग्रेस को पाक-साफ मानते हैं? यदि नहीं, तो फिर उनके लिए कांग्रेस भी उतनी ही अस्पृश्य होनी चाहिए, जितनी कि भाजपा या मोदी। मोदी को इस मुद्दे पर घेरने वालों को कुछ भी कहने से पहले राजीव गांधी के उस बयान को जरूर याद करना चाहिए।












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