‘मोदी फोबिया’ बना अफजल गुरु की फांसी का ‘फंदा’?

क्या हुआ गर अफजल गुरु को फाँसी पर चढ़ा दिया गया? उसकी फाँसी पर पहली मुहर तो उच्चतम न्यायालय ने लगा ही दी थी, तो दूसरी मुहर गत 21 नवम्बर को लगी, जब अजमल कसाब को फाँसी पर चढ़ाया गया। राष्ट्रपति ने तो तीसरी मुहर लगाई। तो क्या हुआ गर अफजल गुरु को 12 वर्षों बाद फाँसी के फंदे पर लटका दिया गया? देश के लोकतंत्र के मंदिर पर हमले के अपराधी आतंकवादी को फाँसी पर लटका देना एक बहुत ही बड़ी घटना है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन क्या हुआ गर इतने गंभीर गुनाहगार पर एक दशक तक राजनीति करने के बाद फाँसी पर लटका दिया गया?

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आप सोच रहे होंगे कि मैं ‘क्या हुआ?' शब्द बार-बार क्यों दोहरा रहा हूँ। कारण है इसके पीछे। वही राजनीति कारण है इसके पीछे। एक दशक तक बेवजह किसी के लिए फायदे, तो किसी के लिए नुकसान का मोहरा रहा अफजल गुरु आज फाँसी के फंदे पर झूलने के बाद भी राजनीतिक हलकों में फायदे और नुकसान के तराजू में तोला जा रहा है।

यह संदेह और यह आशंका बेवजह नहीं है। इसका बीज तो 21 नवम्बर, 2012 को ही पड़ गया था, जब एक तरफ गुजरात नहीं... नहीं... नरेन्द्र मोदी जैसे महत्वपूर्ण राजनेता के राजनीतिक भविष्य का निर्धारण करने वाले गुजरात में विधानसभा चुनाव का माहौल गर्म था, तो दूसरी तरफ केन्द्र सरकार की ओर से मतदान से ठीक बीस दिन पहले मुंबई हमले के गुनाहगार अजमल कसाब को फाँसी पर लटका दिया गया। कहना होगा कि उस वक्त भी अजमल कसाब की फाँसी को गुजरात चुनाव से जोड़ कर देखा गया था, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के इस बादशाह पर अफजल गुरु को हुकम का इक्का बनाया। यदि मान लीजिए कि कांग्रेस इस बादशाह के जरिए नरेन्द्र मोदी की आंधी को गुजरात में रोकने का मंसूबा संजोए थी, तो यह भी स्पष्ट हो चुका है कि कांग्रेस अपनी इस चाल में सफल नहीं हो सकी।

गुजरात की जनता ने याददाश्त के दोहरे मानदंडों को प्रमाणित किया। पहला तो यह कि जनता बहुत कुछ बहुत जल्दी भूल जाती है और दूसरा कि जनता के मन में कई मुद्दे ऐसे होते हैं, जो गहराई तक पैठ बना चुके होते हैं। संभवतः यही कारण था कि गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी ही मुद्दा थे और मोदी ही जीते भी। ठीक है, एक दिन, दो दिन या कुछ दिनों के लिए मीडिया में छाए मोदी की जगह कसाब ने ले ली, परंतु जनता के दिल में मोदी की अमिट छाप बनी रही। कसाब गायब हुआ और मोदी फिर हावी हो गए।

खैर यह तो हुई अजमल कसाब की बात। आज तो अफजल गुरु का दिन है। पिछले एक सप्ताह से चर्चा की धुरि बन चुके नरेन्द्र मोदी आज अचानक मीडिया और टीवी न्यूज चैनलों के पर्दे से गायब हो गए। हालाँकि इस पूरे सप्ताह के दौरान मोदी एक ही बार बोले, वो भी दिल्ली के श्री राम कॉमर्स कॉलेज में। बाकी जितनी भी बार उनका नाम या तसवीर न्यूज चैनलों पर दिखे, वह सांकेतिक ही थे, क्योंकि मोदी स्वयं कुछ नहीं कर रहे थे, बल्कि एक मुद्दे के रूप में चर्चा में छाए हुए थे।

और आज सुबह मोदी की जगह उनका वह हुकम का इक्का मीडिया में-चर्चा में छाया हुआ था, जिसे उन्होंने विधानसभा चुनाव में फेंका था। खैर पहली बार देखने में तो यही लग रहा था कि केन्द्र सरकार ने यह काम एकदम एक ऑपरेशन की तरह और पूरी गोपनीयता के साथ किया। मानो पोखरण में परमाणु परीक्षण करने वाली बात हो, लेकिन दूरदृष्टि से देखा जाए, तो यह सब अचानक होने वाली बात नहीं लगती।

जिस प्रकार पिछले एक सप्ताह से मीडिया में नरेन्द्र मोदी छाए हुए थे, उससे उनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा था। वैसे भी मोदी के राजनीतिक जीवन व सफलता का महत्वपूर्ण पहलू ही उनका चर्चा में रहना रहा है। फिर वह चर्चा नकारात्मक हो या सकारात्मक। और इस बार तो दिल्ली से लेकर कुंभ मेले तक मोदी ही मोदी की गूंज थी। हर न्यूज चैनल मानो मोदी के बारे में खबर दिखाने को आतुर था। संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, कुंभ, हिन्दुत्व, प्रवीण तोगडिया मीडिया में इस कदर छा चुके थे, मानो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी देश की राजनीति में कोई मायने ही न रखते हों? जबकि ये तीनों इस समय देश की सत्ता के तीन महत्वपूर्ण केन्द्र है।

इस तरह के हालात पैदा हुए कि समर्थकों के लिए मोदी मंत्र बनते जा रहे थे, तो विरोधियों के लिए खासकर गुजरात में लगातार झुलसती आ रही कांग्रेस के लिए मोदी एक फोबिया बनते जा रहे थे। मोदी के बढ़ते कदम और उनके पक्ष-विपक्ष में जारी चर्चाओं की आंधी को रोकने का कोई तरीका तो सोचना ही था। संभवतः अचानक कांग्रेस को अजमल के बाद अफजल की याद आ गई और अफजल, जिसका हश्र आज नहीं तो कल यही होना था, को फाँसी पर लटका दिया गया और पूरा मीडिया अपना रुख बदलने पर विवश हो गया।

इस सारी बहस के मायने क्या ये नहीं निकाले जा सकते कि गुजरात में कांग्रेस के गले की फाँस बने मोदी का फोबिया जहाँ गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले अजमल कसाब के लिए फंदा बना, वहीं लोकसभा चुनाव से पहले तेजी से बढ़ता यह मोदी फोबिया अब अफजल गुरु के लिए भी फंदा साबित हुआ? भाई यह आकलन केवल मेरा ही नहीं है, बल्कि आज मोदी समर्थकों की ओर से फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया में किए जा रहे कमेन्ट्स और पोस्ट्स भी कुछ यही बयाँ करते हैं।

आपकी क्या राय है। कमेन्ट बॉक्स में लिखिए।

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