युवाओं को उस 'नरेंद्र' की याद दिला गये मोदी

नई दिल्‍ली। डेढ़ महीने पहले निराशा और आक्रोश से उद्वेलित दिल्ली आज आशान्वित और उत्साहित थी। क्या खास था आज दिल्ली के लिए? सामूहिक बलात्कार कांड से झुलसी दिल्ली मानो आज किसी शांत-शीतल वर्षा से भीगने को आतुर थी और शाम ढले यह वर्षा गरज के साथ हुई भी। किसकी प्रतीक्षा थी? कौन बरसा शांत-शीतल जल के रूप में और वह भी गरज के साथ? विरोधाभास है मेरे शब्दों में। एक तरफ शांत-शीतल जल है, जो आक्रोशित-निराश लोगों के लिए है और दूसरी तरफ गर्जना है, जिसमें आशाओं और उत्साह की गूँज है। इस प्रतीक्षा, इस आशा और इस उत्साह का नाम है नरेंद्र मोदी।

दिल्ली का श्री राम कॉमर्स कॉलेज (एसआरसीसी) और वहाँ उपस्थित बड़े-बड़े महानुभाव तथा बड़ी संख्या में उपस्थित विद्यार्थी नरेंद्र मोदी का इंतजार कर रहे थे और जब मोदी आए, तो सभी अपलक उन्हें देखते रह गए और जब मोदी बोलने लगे, तो कर्णेन्द्रियाँ मानो केवल मोदी पर ही केन्द्रित रह गईं। देश भर का मीडिया मोदी के भाषण को लाइव दिखा रहा था।

Narendra Modi

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जब एसआरसीसी में बोलने के लिए खड़े हुए, तब तक यह मात्र एक कॉलेज का कार्यक्रम था, लेकिन उन्हें लेकर जिस तरह का उत्साह पूरी दिल्ली और देश में था, उसने एसआरसीसी के कार्यक्रम के दौरान 120 साल पुरानी विश्व धर्म संसद की याद ताजा करा दी। सन् 1893 में अमरीका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में पूरी दुनिया के सामने भारत का डंका बजाने वाले का नाम नरेंद्र था, तो आज एसआरसीसी में पूरे भारत के समक्ष गुजरात का डंका बजाने वाले का नाम भी नरेंद्र ही था।

उस नरेंद्र ने पूरी दुनिया के सामने भारत के शक्ति-सामर्थ्य और अध्यात्म को प्रस्तुत कर स्वाभिमान की अलख जगाई, तो आज इस नरेंद्र ने निराशा के माहौल से घिरे भारत के समक्ष उसके सामर्थ्य को प्रस्तुत किया और यह दर्शाने का प्रयास किया कि यदि गुजरात का रास्ता भारत अपनाए, तो भारत में भी वह सब कुछ इसी कानून-संविधान के दायरे में रह कर हो सकता है, जो पिछले ग्यारह वर्षों में गुजरात में हुआ है।

दरअसल नरेंद्र मोदी के आज के इस भाषण की तुलना शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद से करना इसलिए भी स्वाभाविक है, क्योंकि उस वक्त के नरेंद्र यानी स्वामी विवेकानंद के समक्ष उस समय गुलाम भारत की आध्यात्मिक शक्ति को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने की चुनौती थी, तो आज के इस आधुनिक नरेंद्र के समक्ष भारतीय राजनीतिक संसद में गुजरात की गीता (विकास गाथा) के जरिए निराशा में घिरे और उनकी ओर आशा भरी नजरों से देख रहे भारत को उबारने की चुनौती है।

यह तो किसी से छिपा नहीं है कि नरेंद्र मोदी वर्तमान भारत में सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके हैं और शुरुआत में बिखरी दिखने वाली भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे इस नाम पर एकमत होने की तैयारी में है। दरअसल नरेंद्र मोदी एक आइकॉन बन चुके हैं। वे अपनी नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही छवियों के चलते एक कट्टरवादी, परंतु शुद्ध और समन्वयवादी धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में उभरे हैं। गोधरा कांड ने जहाँ उन्हें एक कट्टर नेता के रूप में छवि प्रदान की है, तो गुजरात के सामूहिक विकास और गुजरात की जनता की लगातार तीसरी बार उन पर मुहर लगने से मोदी एक विकास पुरुष के रूप में भी उभरे हैं, जो व्यक्ति-समूह-जाति-धर्म आधारित विकास नहीं, बल्कि सामूहिक विकास की राजनीति करते हैं।

गुजरात को मात्र गुजरात नहीं, बल्कि छह करोड़ गुजरातियों का पर्याय बनाने वाले नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में एकमत गुजरात का नारा दिया और उनसे प्रभावित भारतीय जनमानस इस एकमत गुजरात के नारे को एकमत भारत के रूप में परिवर्तित करने को आतुर है। बात जब एकमत की आती है, तो उसमें व्यक्ति, समूह, जाति, वर्ग, धर्म कुछ नहीं बचता।

नरेंद्र मोदी को एक तरफ विकास के आधार पर समर्थन मिल रहा है, तो दूसरी तरफ उनकी शुद्ध धर्मनिरपेक्षता ने उस खास वर्ग पर भी अपनी पकड़ जमाई है, जो तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल वोट बैंक के रूप में लगातार होने वाले अपने इस्तेमाल से आहत रहा है। इस प्रकार विकास के नाम पर सबको साथ लेने वाले नरेंद्र मोदी को भारतीय अध्यात्म, सनातन धर्म और हिन्दुत्व की धुरि बनाने की भी कोशिश की जा रही है। कुंभ मेले में उनके नाम की गूँज इस बात का प्रमाण है।

नरेंद्र मोदी का यह चेहरा न तो कांग्रेस की समझ में आता है और न मोदी के विरोधियों की, लेकिन आम भारतीय इस चेहरे को समझ चुका है, जिसमें वह खास वर्ग भी शामिल है, जो कथित रूप से मोदी का विरोधी माना जाता है। मोदी का जो स्पष्ट चेहरा है, वह उन्हें शुद्ध धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में स्थापित करता है। ऐसा शुद्ध धर्मनिरपेक्ष, जिसकी सोच किसी धर्म-जाति पर नहीं ठहरती, बल्कि भारतीय अध्यात्म और जीवनशैली यानी हिन्दुत्व की धुरि पर टिकी हुई है।

बस, इसीलिए आज के एसआरसीसी के कार्यक्रम को भारतीय राजनीति की धर्म संसद की संज्ञा दी जा सकती है, जहाँ से नरेंद्र मोदी ने गुजरात की गीता का राग छेड़ कर उसे पूरे भारत में लागू करने का बिगुल फूँका है। वे इस राजनीतिक संसद के आधुनिक स्वामी विवेकानंद साबित हुए हैं।

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