क्या होता अगर अमेरिकी होते सुभाष चंद्र बोस?
[अजय मोहन] नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में कौन नहीं जानता। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा का नारा लगाने वाले नेताजी ने देश के युवाओं को सिखाया था कि नौकरी नहीं देश के लिये जियो। उनके जन्म के बारे में तो सबको पता है, लेकिन उनकी मौत का रहस्य आज भी बरकरार है। जरा सोचिये आज़ादी के आंदोलन में अंग्रेज सरकार पर सैन्य हमला करने वाले नेताजी अगर अमेरिकी होते तो क्या होता?
इस सवाल का हल खोजने के लिये हम आपको 2008 के मुंबई आतंकी हमले की ओर ले चलते हैं। इस हमले में चार अमेरिकी नागरिकों की मौत हुई और 2 घायल हुए। अमेरिकी सरकार चाहती तो सीधे कह देती कि यह हमला आतंकियों ने भारत पर किया, तो हमलावरों को पकड़ने की जिम्मेदारी भारत की। लेकिन नहीं। अमेरिका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एफबीआई के लिये यह नाक का सवाल बन गया। उसने अपने चार आम अमेरिकी नागरिकों की मौत के जिम्मेदार लोगों को पकड़ने के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभियान छेड़ दिया। जिस भारत के 138 लोग मारे गये, उसकी सीबीआई और आईबी पीछे रह गई और एफबीआई ने तहव्वुर राणा और डेविड हेडली को धर दबोचा। आज दोनों अमेरिका की जेल में हैं।
जरा सोचिये महज चार आम नागरिकों की मौत का रहस्य खोजने लिये एफबीआई के अधिकारी सोना-खाना-पीना तक भूल गये, अगर उनके देश के किसी स्वतंत्रता सेनानी की रहस्यमय मौत होती तो क्या होता? अगर जापान आकर यह कह देता कि ताईवान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विमान दुर्घटना में मौत हो गई, तो क्या अमेरिका आसानी से मान लेता? पूरे देश को पता है कि आजाद हिन्द फौज के लिये इकठ्ठा किया गया धन करोड़ों में था, नेताजी की मौत के बाद क्या एफबीआई उस धन की खोज कर राजकीय कोष में डालने की कोशिश नहीं करता? जरूर करता, लेकिन हमारी खुफिया एजेंसियों ने कभी इस बात की ज़हमत नहीं उठाई। बल्कि केंद्र सरकार ने जापानी सरकार की सारी बातों को आसानी से स्वीकार किया और कभी भी नेताजी की मौत के रहस्य को जानने की कोशिशें महज औपचारिकतावश कीं। यह तक जानने की कोशिश नहीं कि मौत से ठीक पहले नेताजी रूस गये थे, तो वहां से वापस भी आये थे कि नहीं? एक आम नागरिक होते हुए हमें अफसोस है कि एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के बारे में हमारी सरकार इतनी ज्यादा उदासीन है।
नेता जी का जीवन सफर-

देशभक्तों का देश भक्त
महात्मा गांधी द्वारा 'देशभक्तों का देश भक्त' उपाधि से नवाजे जाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म उड़ीसा के कटक में 23 जनवरी 1897 को हुआ था। उनकी माता का नाम प्रभावती और पिता का नाम जानकीनाथ बोस था। वह अपने माता पिता की चौदह संतानों में से नवीं संतान थे। उनके बारे में गांधी जी का विचार था कि अगर सुभाष बाबू होते तो भारत का विभाजन न होता।

राजनीतिक जीवन का प्रारम्भ
यह पहला मौका था जब 20 जुलाई 1921 को सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी से मिले। देश बन्धु चितरंजन दास के कार्यों से प्रेरित होने के कारण वह गांधी जी की सलाह पर दासबाबू के साथ काम करने लगे। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन का प्रारम्भ हुआ। इन दिनों गांधी जी अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन चला रहे थे।

स्वराज पार्टी
नेताजी बंगाल में इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। सुभाष इस आंदोलन में उनके साझीदार हो गये। 1922 में ही कांग्रेस के अंतर्गत दासबाबू ने स्वराज पार्टी बनाई। अपनी कार्यकुशलता और गंभीर व्यक्तिव के कारण वह जल्द ही देश के बड़े नेताओं में शामिल हो गये।

भगत सिंह की फांसी
जब साइमन कमीशन भारत आया तो सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेज सरकार का विरोध करने के लिए आंदोलन का नेतृत्व भी किया। लेकिन भगत सिंह की फांसी के रोकने के लिए गांधी जी द्वारा अंग्रेजों से समझौता न तोड़ा। कुछ दिनों बाद ही भगत सिंह को फांसी दे दी गई जिससे वह कांग्रेस और गांधी जी से नाराज हो गये।

डलहौजी चले गये
5 नवंबर 1925 को चितरंजन दास की मृत्यु के समय वह कारागार में थे और उन्हें तपेदिक हो गया। जेल से रिहाई होने के बाद वह इलाज के लिए डलहौजी चले गये। सुभाष 1933 से 1936 तक यूरोप में रहे। वह अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर भारत आये जहां अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन्हें फिर से यूरोप भेज दिया।

आजाद हिंद फौज
सुभाष चन्द्र बोस ने जापान की मदद से आजाद हिंद फौज का गठन किया। इसके अलावा कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड पार्टी का उन्होने गठन किया। कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद फारवर्ड ब्लॉक एक स्वतंत्र पार्टी बन गयी।

द्वितीय विश्वयुद्ध में
अंग्रेजों द्वारा कैद किये जाने के बाद वह अपना रूप बदलकर फरार हो गये। अपने जर्मनी प्रवास के दौरान वह हिटलर से भी मिले। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होने कई विदेश यात्राएं की। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद वह रूस से सहायता के लिए 18 अगस्त 1945 को हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। जापान की एक न्यूज एजेंसी के मुताबिक ताइवान की भूमि पर हवाई जहाज दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी।

बोस की मौत
उस दौरान तो पूरी दुनिया ने मान लिया कि हवाई हादसे में बोस की मौत हो गई, लेकिन सन 2005 में अचानक ताइवान सरकार ने खुलासा किया कि उस दिन कोई भी हवाई दुर्घटना नहीं हुई। यह वो दिन था जिसके बाद नेता जी को कभी भी नहीं देखा गया।

नेताजी की अस्थियाँ
उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल नेताजी ने अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने अंतिम सांस ले ली। फिर नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी टोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयीं। आज भी उनकी अस्थियां वहीं हैं।

घटना की जांच
स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने इस घटना की जांच के लिए, 1956 और 1977 में दो बार एक आयोग का गठन किया गया लेकिन दोनो बार यह नतिजा निकला की नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये थे। लेकिन इन दोनो आयोगों ने कभी ताईवान सरकार से बात ही नहीं की।












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