Excl : राहुल के गांधी का नहीं, मोदी के महात्मा का गुजरात!
अहमदाबाद। भारत में आम तौर पर जब चुनाव होते हैं, तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बिना बात ही चुनाव मैदान में ला खड़े किए जाते हैं। परतंत्र भारत के जननायक मोहनदास करमचंद गांधी स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपिता कहलाए। स्वतंत्रता से पहले ही महात्मा की उपाधि भी पा ली। स्वतंत्र के बाद न कोई पद चाहा और न ही अपने परिवार के लिए कोई ऐसी राजनीतिक विरासत छोड़ी कि पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ बैठ कर खा सकें। इतनी निष्काम और निःस्वार्थ सेवा के बावजूद आखिर देश में जब भी चुनाव आता है, तो गांधी को उसमें खदेड़ लाया जाता है।
गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में भी गांधी चर्चा में रहे। हों भी क्यों नहीं? आखिर गांधी गुजरात के ही तो थे, लेकिन क्या गुजरात गांधी का अब भी है? खैर, इस प्रश्न के कई उत्तर हो सकते हैं। गांधी विचारधारा को समर्पित गुजरात कभी भी गांधी से दूर तो हो नहीं सकता, लेकिन गांधी की विरासत को जबरन ढोने वालों ने गुजरात से गांधी की दूरियाँ लगातार बढ़ाने का काम किया और उसका कारण भी शायद स्पष्ट है कि देश में कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए गांधी कोई व्यक्तित्व नहीं, बल्कि व्यक्तिगत या पार्टीगत पहचान का हिस्सा बन कर रह गए हैं और यही कारण है कि यदाकदा ही-अकारण ही राजनीतिक लाभ या सत्ता लालसा को पूर्ण करने के लिए गांधी को चुनावी मैदान में उतार दिया जाता है।

अब बात गुजरात की ही करते हैं, क्योंकि चुनाव हाल ही में यहीं सम्पन्न हुए हैं। गांधीजी की जन्म स्थली पोरबंदर है। ऐसे में गुजरात विधानसभा चुनाव में भी गांधी को झोंकने की कोशिश होना लाजिमी ही था। वैसे गांधी की विरासत का दावा करने वालों के भरोसे ही गुजरात चुनाव की नैया सौंपने वाले प्रदेश कांग्रेस के नेता अपने अभियान की शुरुआत ही गांधी से किया करते हैं। हालाँकि वह गांधी महात्मा गांधी नहीं, बल्कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी हैं। इन गांधियों के आते ही महात्मा गांधी चुनाव मैदान में उतार दिए जाते हैं। दोनों ही नेताओं ने गुजरात में आकर चुनाव सभाएँ कीं और चीख-चीख कर गुजरात को गांधी का गुजरात बताया। मानो गुजरात यह बात भूल गया था। राहुल गांधी तो बाकायदा गांधी कथा लेकर गुजरात आए, लेकिन चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि गुजरात को राहुल का गांधी रास नहीं आया।
हालाँकि राहुल जिस गांधी की बात कर रहे थे, वे गांधी तो आज भी प्रासंगिक हैं और सदियों तक रहेंगे, लेकिन राहुल की गांधी कथा गुजरातियों के गले नहीं उतरी और जब मोदी ने गांधी कथा में जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल आचरण के पात्र की खिल्ली उड़ाई। इतना ही नहीं मोदी ने तो अपने एक चुनावी भाषण में स्पष्ट शब्दों में कह भी दिया कि राहुल गांधी महात्मा गांधी की प्रत्यक्ष विरासत नहीं हैं। मोदी ने हालाँकि यह बात गुजराती में कही थी कि तेओ गांधीना सीधी लीटीना वारसदार नथी जिसका यही अर्थ होता है, परंतु शायद मोदी के इस बयान को मीडिया ने गौर से नहीं सुना और यह चर्चा में नहीं आया, लेकिन जनता मोदी का इशारा भलीभाँति समझ चुकी थी।
राहुल की गांधी कथा पर मोदी के पलटवार के बाद तो राहुल की गांधी कथा को लोग मुँह तक ले जाने को भी तैयार नहीं दिखे और इसका साक्षात् दृष्टांत है गांधी का जन्म स्थल पोरबंदर। पोरबंदर लोकसभा क्षेत्र से सांसद विट्ठल रादडिया ने चुनाव से कुछ दिन पहले अपनी दबंगई दिखा कर पहले ही गांधी का नाम खूब रोशन कर दिया था और जब जनता को मौका मिला, तो उसने गांधी की विरासत को ढोने का दावा करने वाली कांग्रेस को पोरबंदर की प्राचीर से संदेश दे दिया कि गांधी का दामन शायद अब कांग्रेस पर बोझ बन रहा है, क्योंकि कांग्रेस जिस गांधी को कंधे पर बैठाए घूम रही है, वह हकीकत में कंधे पर या सिर पर बैठाने की चीज नहीं, बल्कि आचरण की चीज है। पोरबंदर की जनता ने गुजरात कांग्रेस के मुखिया अर्जुन मोढवाडिया को परास्त कर कांग्रेस की गांधीवादी राजनीति पर पहला प्रश्नचिह्न खड़ा किया, तो पूरे परिणामों ने साफ कर दिया कि राहुल की गांधी कथा गुजरात में एक फ्लॉप फिल्म की तरह साबित हुई।
दरअसल गुजरात को राहुल का गांधी नहीं सुहाया। गुजरात तो दीवाना है मोदी के महात्मा का। अरे भाई, हम नहीं कह रहे। लोकतांत्रिक ढंग से आया जनादेश यह कह रहा है। ऐसा नहीं है कि गांधी की चर्चा कांग्रेस की ही बपौती है। गुजरात में भी गांधी की चर्चा होती है, लेकिन गांधी... गांधी... गांधी... का शोर नहीं होता। गुजरात में गांधी विख्यात है महात्मा के रूप में और अभी अगले महीने यह महात्मा गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में गूंजेगा। गुजरात में विख्यात है महात्मा मंदिर। गुजरात के लोगों को मोदी के महात्मा ने मोहा है। राहुल के गांधी दरअसल उनकी अपनी राजनीतिक विरासत तक सिमट गए हैं, जबकि मोदी के महात्मा किसी पार्टी का प्रतीक नहीं हैं। राहुल के गांधी कांग्रेस के आचरण से शायद जनता को बहुत दूर लगते हैं, तो मोदी के महात्मा राजधानी गांधीनगर स्थित सेक्टर 3 में साकार होते जा रहे हैं महात्मा मंदिर के रूप में। यह महात्मा मंदिर आगामी 11 से 14 जनवरी के दौरान देश-विदेश में चर्चा का केन्द्र बनेगा, जब वहाँ पाँचवाँ वाइब्रेंट गुजरात अंतरराष्ट्रीय निवेशक सम्मेलन आयोजित होगा। इस महात्मा मंदिर को कई आलोचकों ने मोदी का मार्केटिंग स्थल भी कहा होगा, लेकिन जनादेश तो यही कहता है कि गुजरात के लोगों के लिए आचरण से कोसों दूर राहुल का गांधी नहीं, बल्कि अपने दिल के करीब साकार होता मोदी का महात्मा ज्यादा मोहता है।
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