फतेहपुर रेप केसः पीड़िता ने छोड़ दी न्याय की उम्मीद!

देश की सर्वोच्चा अदालत ‘सुप्रीम कोर्ट' भी कहती है कि किसी बालिग को उसकी मर्जी के खिलाफ नहीं रोका जा सकता। लेकिन, उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए यह आदेश बेमतलब साबित हो रहा है। फतेहपुर शहर में रेप की शिकार हुई दलित छात्रा जिस तरह पांच माह से दर-दर भटक कर मानसिक शोषण बर्दाश्त कर रही है, उसके सबक लेते हुए शायद ही कोई महिला अपने खिलाफ हुई हिंसा की शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत पुलिस के सामने करेगी।
विदित है कि इस छात्रा की एफआईआर दर्ज करने से पहले नगर सीओ गौरव सिंह चार दिन तक महिला थाने में बंद कर यह समझाने का प्रयास किया कि मुकदमें धन और गवाही की जरूरत होती है, जो तुम्हारे पास नहीं है, इसलिए बतौर मुआवजा आरोपियों कुछ दिला दें और शान्त हो जाओ। जब उसने थाने में ही ‘आत्महत्या' कर लेने की धमकी दी, तब पुलिस ने 24 नवम्बर की रात मु. अ. संख्या-567/12, धारा-493, 313, 376, 504, 506 आईपीसी एवं 3(1)12 एससी-एसटी एक्ट का अभियोग दर्ज कराकर हड़बड़ी में आधी रात को आन्तरिक अंगों का चिकित्सीय परीक्षण कराकर मुख्य अभियुक्त की रिश्तेदार द्वारा संचालित एक नारी निकेतन में दाखिल कर दिया। जहां वह मानसिक उत्पीड़न झेल रही है।
इस मामले में अब तक पुलिस कार्रवाई के नाम पर सिर्फ विवेचक ने सीआरपीसी की धारा-161 के तहत पीड़िता का बयान दर्ज कर पाए हैं। अब तक वह सीजेएम न्यायालय में 164 के बयानों की अर्जी तक देने की जरूरत नहीं समझी और न ही घटना स्थलों के ही निरीक्षण करने की फुर्सत मिली है।
वनइंडिया ने जब सोमवार को आईओ के रीडर से इस बारे में पूंछा तो उन्होंने बताया कि ‘साहब आज मीटिंग में व्यस्त थे, अगले दिल ही कुछ किया जा सकता है।' रीडर के इस जवाब से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस कितना गंभीरता से इस मामले को ले रही है। उधर, अभियुक्तों का आलम यह है कि वह एक राय बनाकर पीड़िता की हत्या करने की योजना को अंतिम रूप दे चुके हैं।
पीड़िता की छोटी बहन कोमल ने बताया कि ‘‘अजय मौर्या के परिजन और डा घनश्याम उसके मां-बाप पर घटना साबित करने के कुछ सादे स्टाम्प पेपर में दस्तखत करा लिए हैं और धमकी दी है कि उन्होंने इस बावत कुछ बोला तो मेरा अपहरण करा लेंगे।' कोमल ने बताया कि ‘वह इस डर से अपने विद्यालय जाना बंद कर दिए है, साथ ही छोटे भाई मोनू को दिल्ली भेज दिया है।' जानकार सूत्रों का कहना कि अभियुक्त सत्ता पक्ष के बेहद करीबी हैं। इसलिए विवेचक उनसे मिले हुए हैं और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचने की स्थिति में पहुंच गए हैं कि दौरान विवेचना कई लोगों को मामले से हटा दिया जाए।
मामले ही ग्राहता पर नजर दौड़ाएं तो नहीं लगता कि कइस पीड़िता को न्याय मिलने के आसार हैं, क्योंकि पुलिस और अपराधियों का गठजोड़ पीड़िता के दर्द से भारी प्रतीत होता है।
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