बुंदेलखंड का जमघट और गोवर्धन पूजा

Diwali
बांदा। उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में हर तीज-त्योहार मनाने के कुछ अलग ही रिवाज हैं, दीपावली के दूसरे दिन जमघट से दो अलग-अलग मान्यताओं के साथ ‘गोवर्धन' पूजा की शुरुआत होती है। अपने को भगवान कृष्‍ण का वंशज बताने वाले ग्वाल ‘गोवर्धन पर्वत' तो किसान वर्ग ‘गोबर-धन' के रूप में एक पखवारा पशुओं के ‘गोबर' की पूजा करते हैं।

प्रकाश पर्व दीपावली के दूसरे दिन को उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में ‘जमघट' के नाम से पुकारा जाता है, जमघट की तड़के ग्रामीण इलाके में अपने को भगवान कृश्ण का वंशज बताने वाले ग्वाल (यादव) समाज के लोग दीवारी नृत्य व बुंदेली गीत ‘बिरहा' गाते हुए पशुओं विशेश कर गायों को जगाते हैं। इसके बदले किसान बक्सीस (इनाम) के तौर पर कुछ अनाज या रुपया भेंट करते हैं, बस, इसी के बाद शुरू हो जाती है ‘गोवर्धन' पूजा।

पुरुष नहीं छू सकते गोवरधन

सबसे खास बात यह है कि यह पूजा सिर्फ महिलाएं ही करती हैं, पुरुष पशुओं के गोबर से बनाए गए ‘गोवर्धन' को छू नहीं सकते। यहां गोवर्धन को महिलाएं ‘गोधन दाई' के नाम से पुकारती हैं। जमघट के दिन सूर्य निकलने से पूर्व घर के पशुओं के गोबर का टीला बनाकर उसमें गाय के नमूना रखती हैं, घर में बचा बासी खाना कटोरी में गोवर्धन को खाने के लिए रखा जाता है।

रोजाना शाम को स्नान के बाद मिट्टी के दीपक ‘दूलिया' की ज्योति जलाई जाती है। महिलाएं छोटी दीवाली यानी कि ‘ड्योठवा' को गोवर्धन का गोबर अपने ही खेत में डालते हैं। इस पखवारे का गोबर कोई भी व्यक्ति अपने किसी अन्य पड़ोसी को नहीं देता। लोगों का मानना है कि गोबर देने से घर-परिवार का पूरा धन चला जाता है।

बांदा जनपद के तेन्दुरा गांव की ग्वाल वंशीय बुजुर्ग महिला रमिनिया का कहना है कि ‘जमघट के दिन भगवान कृष्‍ण गोकुल में गोपिकाओं के साथ दीवारी नृत्य कर रहे थे, गोकुलवासी भगवान इन्द्र की पूजा करना भूल गए तो नाराज होकर इन्द्र ने वहां जोर का पानी बरसा दिया, जिससे गोकुल में पानी की बाढ़ आ गई। भगवान कृष्‍ण ने अपनी तर्जनी (उंगली) में गोवर्धन पर्वत उठा कर गोकुलवासियों की रक्षा की थी, तभी से ‘गोवर्धन' पूजा की परम्परा चली आ रही है।'

इसी गांव के किसान शेशकुमार सिंह का कहना है कि ‘गोबर ‘पशुधन' है पशु किसान का सबसे बड़ा धन होता है, किसान ‘गोवर्धन' नहीं, बल्कि ‘गोबर-धन' की पूजा करते हैं।' धर्मग्रंथों की जानकारी रखने वाले पनगरा गांव के रहने वाले बुजुर्ग पंडि़त बद्री प्रसाद दीक्षित का कहना है कि ‘गोवर्धन' या ‘गोबर-धन' दोनों की पूजा प्रासांगिक हैं।

ये पुरानी परम्पराएं हैं, जिन्हें न तो बदला जा सकता और न ही टिप्पणी करना ही उचित होगा।' वह कहते हैं कि ‘हिन्दू धर्म को मानने वाला हर समाज ‘गोवर्धन' की पूजा करता है। आस्थाएं अलग हो सकती हैं, पर उद्देश्य सबके एक हैं कि परिवार में कोई ‘अनिष्‍ठ' न हो।'

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+