कृष्ण जन्मभूमि से राम जन्मभूमि तक पहुंचा दंगा

रात में दर्जनों दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। दुकानों की आग इतनी बढ़ गई कि उस पर काबू पाने के लिए सेना बुलानी पड़ी। गुरुवार तडक़े आग पर काबू पा लिया गया लेकिन कुछ दुकानों से आग सुलगती दिखाई पडऩे से उपद्रवियों ने चौक में एक धार्मिक स्थल को भी आग लगा दी। जब स्थिति काबू में नहीं आई तो सुबह नौ बजे के करीब शहरी इलाके में कफ्र्यू लगा दिया गया।
प्रदेश में सभी घटनाओं की शुरूआत छोटे-छोटे विवाद से हुई। जिन पर पुलिस ने सही समय पर ध्यान नहीं दिया और देखते ही देखते पूरा शहर दंगों की चपेट में आ गए। अब तक मथुरा के कोसीकलां, प्रतापगढ़, बरेली, लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, गाजियाबाद के बाद अब प्रदेश का सबसे संवेदनशील जिला फैजाबाद दंगे की चपेद में आ चुके हैं। पुलिस के आला अधिकारी मथुरा और बरेली के दंगों को तो साम्प्रदायिक मानते हैं लेकिन बाकी जगह हुई घटनाओं को बवाल कहते हैं।
प्रदेश के एडीजी लॉ एण्ड ऑर्डर जगमोहन यादव ने कहते हैं कि डीजीपी और प्रमुख सचिव गृह मंडलों में समीक्षा कर ही रहे हैं। वहीं वे स्वंय साम्प्रदायिक दंगों की स्थिति में मोर्चा संभाल रहे हैं। यदि पछिली घटनाओं पर नजर डाली जाए तो पहली घटना 1 जून, 2012 की दोपहर करीब दो बजे मथुरा के कोसीकलां में सराय शाही इलाके में पीने के पानी भरे ड्रम में हाथ डालने को लेकर हुआ।
विवाद इतना बढ़ गया कि उसने साम्प्रदायिक दंगे का रूप ले लिया। घटना में चार की मौत और दर्जनों घायल हो गए। पुलिस को भी भारी पथराव और फायरिंग का सामना करना पड़ा बाद में यहां कफ्र्यू लगा कर नियंत्रित किया गया। इसके बाद 23 जुलाई, 2012 को बरेली शहर में सावन के दौरान कांवरियों और चाय की दुकान वालों के बीच विवाद हुआ। उपद्रवियों ने पूरे शहर में जमकर बवाल काटा। घटना में तीन लोगों की मौत हुई। शहर के कई थाना क्षेत्रों में कफ्र्यू लगा रहा। 11 अगस्त को कफ्र्यू हटाए जाने के चार दिन बाद ही यहां दो समुदाय फिर से भिड़ गए।
जमकर पत्थर बाजी हुई और गोलियां चलीं। प्रशासन को दोबारा कफ्र्यू लगाना पड़ा। इन दोनों दंगों में 38 एफआईआर और 293 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 17 अगस्त 2012 को लखनऊ में असम में हुई हिंसा का हवाला देकर अलविदा की नमाज के बाद कुछ अराजकतत्वों ने शहर का माहौल बिगाड़ दिया। उपद्रवियों ने गौतम बुद्ध व हाथी पार्क में घुसकर पर्यटकों से अभद्रता की, कमर्चारियों को पीटा, दुकानें लूट लीं, पुलिस की बाइक फूंक दी, पांच बसों समेत कई वाहनों में तोडफ़ोड़ की और राहगीरों से अभद्रता की। मीडियाकमिर्यों को भी पीटा और लूटपाट की।
इसी दिन असम में हुई हिंसा को लेकर इलाहाबाद और कानुपर में करीब 5000 लोगों की भीड़ ने 200 गाडिय़ों को तोड़ डाला और दुकानें लूट लीं। इस हिंसा के बाद प्रशासन को इलाहाबाद में कफ्र्यू और कानपुर में भारी पुलिस बल तैनान करना पड़ा। वहीं 14 सितम्बर, 2012- गाजियाबाद में किसी शरारती तत्व ने एक धार्मिक ग्रन्थ के पन्ने पर अपशब्द लिखकर मसूरी के आध्यात्मिक नगर रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया था। आक्रोशित लोगों ने मसूरी थाने में घुसकर पुलिसकर्मियों से हाथापाई की और वहां खड़े वाहनों को फूंक डाला।
पुलिस के अधिकारी कर्मचारी समेत दर्जनों लोग घायल हुए। करीब 50 वाहन क्षतिग्रस्त हुए। पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई जिसमें छह लोगों की मौत हुई।
इस पर नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या ने कहा कि इस सरकार ने जनता को अब तक दंगा, बलात्कार, अपहरण, डकैती और हत्या ही दी है। प्रदेश की जनता मायावती के शासन को याद करने लगी है। हम चुप नहीं बैठेंगे। सडक़ से सदन तक इस सरकार का विरोध करेंगे। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने उपद्रव के लिए राज्य सरकार को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराते हुए इसे प्रशासनिक विफलता का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि बहुसंख्यकों के त्योहारों पर इस तरह की घटनाओं की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता विरेन्द्र मदान ने कहा कि जब से प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकारें बन रही है तब से प्रदेश दंगा मुक्त नहीं हो पाया।












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