पितृपक्ष विशेष: मौत के बाद भी मुक्ति का इंतजार

हालांकि वह पितृपक्ष में पितरों की मुक्ति के लिए दान पुण्य व ढेरों अनुष्ठान कर देते हैं। मार्डन लोगों की हकीकत जाननी हो तो श्मशान पर जरूर जाएं जहां अस्थियों से भरी दर्जनों मटकियां किसी अपने का इंतजार कर रही है ताकि विजर्सन के बाद उनको मुक्ति मिल सके।
हिन्दु रीति-रिवाज के मुताबिक मरने के बाद व्यक्ति की आत्मा तब तक मुक्त नहीं होती जब तक कि उसकी अस्थियों को विसर्जित न कर दिया जाये। आत्मा मुक्ति के लिए ये कर्म कांड अनिवार्य माने जाते हैं लेकिन श्मशान घाटों पर एकत्रित मटकियां बातती है कि उन्हें अभी मुक्ति नहीं मिली जबकि उनका दाह संस्कार करने वाले उनके अपने उन मटकियों को भूल चुके होते हैं।
दाह संस्कार कर वह लोग भूल गये कि अस्थियों को विसर्जित करना उनका दायित्व है। श्मशान पर काम करने वाले लोग बताते हैं कि श्मशान में अंतिम संस्कार करने के बाद इनके परिजन यहां ये कह रख जाते है कि कुछ दिन बाद हम इनको यहां से ले जायेंगे लेकिन महीनों बीत जाने के बाद इनको लेने कोई नहीं आता है और ये मटकियां ऐसे ही यहां लटकी रहती है। वहीं धर्म के जानकारों के मुताबिक जब तक अस्थियों को पवित्र गंगा में प्रवाहित नहीं किया जाता है तब तक उनकी आत्मा मुक्ति कि तलाश में भटकती है।
श्मशान भूमि के कर्मचारियों के मुताबिक यहां लोग बड़े ही श्रद्धा से मटकी रख के जाते है लेकिन फिर पलट के नहीं देखते हैं। शास्त्रों के मुताबिक पुत्र और अन्य का ये कर्तव्य है कि वे अपने माता-पिता की मुक्ति के लिए अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करना अनिवार्य है ताकि मृत प्राणी को परलोक में सुख प्राप्त हो सके। धार्मिक लोग कहते हैं कि श्राद्ध के माह में तमाम तरह के धार्मिक अनुष्ठान लोग करते है।
ऐसे में श्मशान में इतनी भारी मात्रा में अस्थियों के होने से निश्चित ही पितृ दोष लगता है। श्मशान घाटों के कर्ताधर्ता बताते हैं अस्थियों को ले जाने वालों का इन्तजार किया जाता है लेकिन जब कोई नहीं आता है तब वे अस्थियां का विसर्जन कर दिया जाता है। परिजनों के इन्तजार के बाद आखिरकार श्मशान के कर्मचारी ही इन अस्थियों को प्रवाहित करते हैं।












Click it and Unblock the Notifications