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मुहब्‍बत से देश प्रेम तक युवाओं में ऊर्जा भरते कुमार विश्‍वास

Poet Kumar Vishwas
मेरा अपना तज़रुबा है तुम्‍हें बतला रहा हूं मैं
कोई लब छू गया था तब कि अबतक गा रहा हूं मैं,
फिराक ए यार में कैसे जिया जाए बिना तड़पे
जो मैं खुद ही नहीं समझा वही समझा रहा हूं मैं।

हम बात कर रहे उनकी जिन्‍हें कोई पागल समझता है कोई दीवाना कहता है। जिन्‍हें भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लाखों युवाओं ने सुना, पढ़ा और डाउनलोड किया है। जिन्‍होंने अपने दिल की आवाज को सुनकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी दी। पीसीएस की नौकरी को लात मार दी और हिन्‍दी की सेवा में लग गये। जी हां मोहब्‍बत के शायर, शब्‍दों के धनी और अपनी कविताओं से लोगों को इश्‍क की गहराई तक ले जाने वाले उस अंतरराष्‍ट्रीय शख्सियत का नाम है डा. कुमार विश्‍वास जिन्‍होंने वनइंडिया के संवाददाता अंकुर कुमार श्रीवास्‍तव से बातचीत की।

आज कुमार विश्‍वास इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन के सक्रिय कार्यकर्ता के साथ ही साथ समाज सेवी अन्‍ना हजारे के मुख्‍य सहयोगी हैं। डा. विश्‍वास हाल ही में देश से भ्रष्‍टाचार को खत्‍म करने और लोकपाल बिल को संसद में पास करने की मांग को लेकर जेल जा चुके हैं। तो आईए आपको रूबरू कराते हैं कुछ उन महत्‍वपूर्ण अंशों से जो डा. कुमार विश्‍वास ने वनइंडिया से खास बताचीत में कहा।

प्रश्‍न: कुमार विश्‍वास वास्‍तव में क्‍या हैं? वर्चुअल कवि, मोटीवेटर, अन्‍ना ब्रिगेड के सिपाही या फिर कुछ और?

डा. विश्‍वास: मैं कवि नहीं बल्कि एक माध्‍यम हूं जो युवाओं के दिल की बात कहता है। आज देश को युवाओं की आवाज सुनने की जरुरत है, क्‍योंकि युवा शक्ति ही देश को विकास की राह पर ला सकती है। मैं कभी खुद को प्रारंपरिक कवियों की श्रेणी में नहीं गिनता।

प्रश्‍न: इंटरनेट के युग में आप कविताओं और हिन्‍दी भाषा के बारे में क्‍या कहना चाहेंगे?

डा. विश्‍वास: मैंने इंटरनेट युग की आहट वर्ष 2003-2004 में पहचान ली थी। मैने उस समय याहू पर पोयट्री ग्रुप बनाया था, जिससे कई लोग जुड़े थे। इंटरनेट एक बेहतरीन साध्‍य है और इसका इस्‍तेमाल करना चाहिए।

प्रश्‍न: टीम अन्‍ना कभी राजनीतिक पार्टी बनाने की बात कह रही है तो कभी नहीं। आपने साफ कह दिया है कि आप राजनीति में नहीं जायेंगे वहीं केजरीवाल राजनीति में कूदने को तैयार दिख रहे हैं। केजरीवाल और किरण बेदी में कुछ सही नहीं चल रहा फिर भी टीम अन्‍ना ये कैसे कह रही है कि ऑल इज वेल?

डा. विश्‍वास: चुनाव लड़ना, राजनीतिक पार्टी बनना कभी हमारी प्राथमिकता नहीं थी। हम आज भी राजनीति में आना नहीं चाहते हैं। मगर लोकपाल बिल के लिये हमें ऐसा करना पड़े तो हम यह भी करने को तैयार हैं। हम हिंसा के रास्‍ते को छोड़कर हर रास्‍ता अपनाने को तैयार हैं। जनलोकपाल, राइट टू रिजेक्‍ट, राइट टू रिकॉल और ग्राम स्‍वराज हमारी मांगे हैं अगर सरकार इसे 2014 से पहले मान लेती है तो हम चुनावी मैदान से पीछे हट जायेंगे। आज की राजनीतिक पार्टियां सिर्फ दिखावे के लिये एक दूसरे का विरोध करती है। हम वो काम कर रहे हैं जो विपक्ष को करनी चाहिए। अगर विपक्ष भी सही होती तो वो अपने शासित राज्‍यों से भ्रष्‍टाचारियों को निकाल बाहर करती और फिर सरकार से कहती कि हमने बाहर किया आप भी करो।

प्रश्‍न: क्‍या आपको लगता है आज देश में कलम आजाद नहीं है?

डा. विश्‍वास: कलम बिल्‍कुल आजाद नहीं है। सरकार को इस बात का भ्रम है कि देश से सरकार नहीं है बल्कि सरकार से देश है। सरकार चाहती है कि उसके खिलाफ ना लिखा जाये इसलिये उसने इंसान और कलम दोनो की आजादी पर पाबंदी लगा दी है।

प्रश्‍न: आपने अपनी वॉल पर लिखा था कि "नजर आसमान पर हो तब भी पांव जमीन पर होना चाहिए! शायरी सियासत से बेहतर है और शुक्र है कि मैं सिर्फ एक शायर रहना चाहता हूं" तो इसका मतलब यह हुआ कि आपकी नजर में राजनीति बहुत गंदी है और आप राजनीति में नहीं जाना चाहते हैं। तो फिर आपकी टीम राजनीतिक विकल्‍प क्‍यो तलाश रही है?

डा. विश्‍वास: हमारी टीम में जितने भी सदस्‍य हैं जैसे केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण और किरण बेदी उनकी समाज और लोगों में पकड़ है। वो लोग पिछले कई सालों से स्‍लम में काम कर रहे हैं। प्रशांत पिछले 10 सालों से गरीबों के लिये काम कर रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि मैंने उनके बराबर काम नहीं किया है। मेरा क्‍या है मुझे युवाओं को आंदोलन के साथ जोड़ने के लिये रखा गया था। आज पार्टी तय कर रही है कि चुनाव कौन लड़ेगा मै चाहता हूं कि यह जनता तय करे।

प्रश्‍न: आप अक्सर कहते हैं कि मीडिया बातों को तरजीह नहीं देती और अपने हिसाब से चीजों को पेश करती है। तो क्‍या आपका आंदोलन मीडिया का सहारा नहीं ले रहा?

डा. विश्‍वास: आज की मीडिया उद्योग समूहों से जुड़ी है। आज की मीडिया दो वर्गों में बंट चुकी है। एक वर्ग जो एडिटर वर्ग के नीचे काम करता है। इस वर्ग में जो हैं वो देश के दर्द को दर्द समझते हैं मगर दूसरा वर्ग है एडिटर वर्ग के उपर है। इस वर्ग के लोग समूह के एजेंडे पर काम करते हैं। कुछ भी हो मगर मीडिया देश की लड़ाई से कटस्‍थ नहीं रह सकती। अब यह मीडिया पर निर्भर करता है कि वह जन आंदोलन के मुद्दे को ठीक समझती है या नहीं।

प्रश्‍न: कार्टूनिस्‍ट असीम त्रिवेदी के साथ जो कुछ भी हुआ आपने उसका विरोध किया लेकिन यह विरोधी सुर आपने केजरीवाल के साथ क्‍यों नहीं मिलाया। वहीं किरण बेदी मुंबई पुलिस के समर्थन में थीं। ऐसा क्‍यों?

डा. विश्‍वास: किरण जी ने जो कुछ भी किया वो उनका व्‍यक्तिगत कदम था। मैंने इसका विरोध किया और खुले तौर पर किया। मैं असीम के लिये मुंबई भी गया था। मेरा मनना है कि किसी कलाकार के साथ क्‍या करना है, इसका फैसला सरकार नहीं कर सकती। कलाकार की सीमा जनता तय करेगी। अगर जनता असीम के कार्टून के खिलाफ रैली निकालती, विरोध करती या फिर कानपुर में उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन होता तो सरकार उसे गिरफ्तार करती तो शायद ठीक होता। रही बात असीम के कार्टून के समर्थन की तो मैं उसके कार्टून से सहमत या असहमत हो सकता हं मगर अभिव्‍क्ति की आजादी को लेकर मैं असीम के साथ हूं।

प्रश्‍न: अन्‍ना के आंदोलन से जुड़ा कुमार विश्‍वास और कवि कुमार विश्‍वास में क्‍या अंतर है?

डा. विश्‍वास: अन्‍ना आंदोलन से मेरा जीवन पूरी तरह प्रभावित है। इस आंदोलन से जुड़ने के बाद मेरा पर्सनल करियर नीचे चला गया। लोगों ने मुझे सरकारी आयोजनों में बुलाना बंद कर दिया। अन्‍ना से जुड़ने के बाद मेरे घर आईटी ने छापेमारी भी की। मगर इसका फायदा भी मुझे मिला। अब मुझे सुकुन मिलता है कि मैं अब सिर्फ अच्‍छे मंच पर जाऊंगा और मेरी जितनी भी सेलिब्रेटी व्‍लैयू या मेरे जितने भी फॉलोवर है उनसे साफ कह सकूंगा कि ऐसे लोगों को चुनो जो आपका और हमारा काम करे।

प्रश्‍न: आज के युवाओं को कवि कुमार विश्‍वास और आंदोलनकारी कुमार विश्‍वास क्‍या संदेश देना चाहेंगे?

डा. विश्‍वास: कवि के तौर पर युवाओं से कहना चाहूंगा कि जो भी करो संपूर्ण करो आधा करने के बारे में सोचो भी नहीं। मैंने प्रेम किया था संपूर्णता के साथ। उसके लिये सबकुछ लुटा दिया और खुद ब खुद सबकुछ सही होता गया। आंदोलनकारी के तौर पर युवाओं से कहना चाहूंगा कि हमेशा देश के बारे में सोचिए।

प्रश्‍न: अंत में आपसे यही एक सवाल कि कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है किसकी इंस्‍प्रेशन है? क्‍या कुछ लाइनें हमारे लिये सुना सकते हैं जो किसी महफिल में नहीं सुनाई?

डा. विश्‍वास: मैं एक लड़की से बेहद प्‍यार करता था। मैं अपने कॉलेज का सबसे प्रॉमीसिंग और तेजतर्रार छात्र था और वह पूरे शहर की सबसे खूबसूरत लड़की। दोनों एक दूसरे को बेहद प्‍यार करते थे। हम दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया था। बात घर तक पहुंची मगर वही पुरानी धारणाएं और वो मुझसे दूर चली गई। मैंने उसकी याद में ही "पगली लड़की" लिखा। नाम पूछने पर कुमार विश्‍वास ने हंसते हुए कहा कि जाने दीजिए अगर उसका नाम ले लिया तो बात लंबी हो जायेगी। चलिए फिर आपके और देश के युवाओं के लिये चार लाइन पेश करता हूं-

मुर्दा लोहे को भी औजार बनाने वाले
अपने आंसू को भी हथियार बनाने वाले
हमको बेकार समझते हैं सियासतदां मगर
हम है इस मुल्‍क की सरकार बनाने वाले

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