अब डॉक्‍टरों को भी पढ़ाया जायेगा कानून

Doctors to do Medico legal course after MBBS
लखनऊ। तमाम प्राइवेट और सरकारी अस्‍पतालों में डॉक्‍टर मनमाने तरीके से इलाज करते चले जाते हैं और मरीजों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। कई जगह डॉक्‍टरों की लापरवाही के कारण भी मौतें होती हैं। ऐसे मामलों की रोकथाम के लिये अब एमबीबीएस डॉक्‍टरों को बताया जायेगा कि उनकी जरा सी लापरवाही का नतीना क्‍या हो सकता है। मरीज तो दूर वे खुद क्‍या भुगत सकते हैं, यह उन्‍हें बताया जायेगा। यानी डॉक्‍टरों को भी कानून पढ़ाया जायेगा।

लखनऊ के केजीएमयू में कुलपतियों के एक सम्‍मेलन में यह निर्णय लिया गया है। इस निर्णय के अंतर्गत एमबीबीएस के बाद उन्हें मेडिको लीगल और कानून की बेसिक जानकारी भी दिये जाने का प्रावधान होगा। इसके लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया पाठ्यक्रम में कानूनी पहलू भी जोड़े जाने पर विचार करे। इससे डॉक्टर को पता चलेगा कि उससे क्या गलतियां हुई, क्यों हुई और क्या उसने नजरअंदाज किया।

एमबीबीएस के लिये अधिकतम 9 साल

चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए कुलपतियों और परीक्षा नियंत्रकों ने कई अहम निर्णय लिया। कुलपतियों का कहना है कि एमबीबीएस और एमडी पाठ्यक्रम में छात्रों को ग्रेस मार्क दिए जाने चाहिए। केजीएमयू के परीक्षा नियंत्रक प्रो. सिद्धार्थ दास ने कहा कि तय किया जा रहा है कि जितने साल का पाठ्यक्रम होगा, उससे दोगुना समय उसे उत्तीर्ण करने के लिए दिया जाए।

साढ़े चार साल के एमबीबीएस पाठ्क्रम के लिए नौ साल और तीन साल की एमडी के लिए छह साल दिए जाएं। इसके अलावा अधिकतर पांच ग्रेस मार्क देने की संस्तुति की जा रही है। इन पांच अंकों को अलग-अलग विषयों में बांटा भी जा सकेगा लेकिन अधिक पांच अंक का ही ग्रेस मार्क दिया जाएगा। केजीएमयू की तरह ही सभी चिविवि में बार कोडिंग को अनिवार्य करने की संस्तुति की गई। इसके अलावा कापियों को दो परीक्षकों से परीक्षण कराने की सहमति बनाई गई। जिससे छात्र पुर्नपरीक्षण की मांग ही न कर सके।

जब दो अलग-अलग परीक्षकों से कापियां जांची जाएंगी तो गलती या गड़बड़ी गुंजाइश ही नहीं बचेगी। अंक देने के सिस्टम को बदलने पर चर्चा की गई। इसमें प्रश्न को अधिक ऑब्जेक्टिव बनाने पर सहमति बनी। इससे छात्र जितना उत्तर सही देगा, उसे उतने अंक दिए जा सकेंगे। स्क्रूटनी सिस्टम को पहले की तरह ही बनाए रखने पर सहमति बनी है। इन संस्तुतियों को एमसीआई के सामने रखा जाएगा।

पैसा चाहते हैं नियंत्रण नहीं

देश के चिकित्सा विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के सम्मेलन में विवि की छटपटाहट उभर कर सामने आयी। चिविवि के वाइस चासंलरों ने कहा कि उन्हें स्वायत्तता चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार बजट दे लेकिन अपना नियंत्रण समाप्त करे, ताकि विवि स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय ले सकें। उनका कहना था कि पैसा भी समय पर मिले ताकि चिकित्सा शिक्षा के लिए आवश्यक कार्य कराए जा सकें। समय पर पैसा न मिलने से उसका सही उपयोग भी नहीं हो पाता। यदि चिविवि के पास अपना कॉरपस फंड हो और यूजीसी की भांति अपना आयोग हो तो चिकित्सा शिक्षा के स्तर में सुधार हो सकता है।

किंग जार्ज मेडिकल युनिवर्सिटी में जुटे 15 चिकित्सा विश्वविद्यालयों के कुलपतियों व परीक्षा नियंत्रकों ने कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर निर्णय लिए। सम्मेलन में जो भी निष्कर्ष निकल उन्हें मेडिकल कांउसिल ऑफ इण्डिया को भेजा जाएगा ताकि मेडिकल कालेज व चिविवि के उचित नियम बनाए जा सकें।

सरकारी अस्पताल भी करें विज्ञापन

मुम्बई के डॉ. सागर गलवांकर कार्पोरेटाइजेशन ऑफ पब्लिक हॉस्पिटल विषय पर कहा कि पब्लिक सेक्टर के हॉस्पिटल भी कॉर्पोरेट की तरह अपनी सेवाओं की ब्रांडिंग करें। इससे अस्पताल को आर्थिक फायदा भी होगा। उन्होंने कहा कि देश में तीन तरह के मरीज हैं। एक पैसा खर्च कर इलाज कराने वाला, दूसरा निम्र मध्यम वर्गीय और तीसरा थर्ड पार्टी क्लास।

इसमें से निम्र मध्यम वर्गीय और थर्ड पार्टी क्लास मरीज पब्लिक सेक्टर के हॉस्पिटल के लिए टारगेट हो सकते हैं। इन्हें अच्छी इलाज की अच्छी सुविधाएं देकर अस्पताल में रोका जा सकता है और उनसे अस्पतालों का आर्थिक लाभ होगा। क्योंकि वो अच्छी सुविधाओं और इलाज के लिए भुगतान भी करेंगे। देश में सरकारी अस्पतालों में एक लाख से भी अधिक बेड हैं। यदि सभी अपनी-अपनी सेवाओं की ब्रांडिंग करें तो आने वाले सालों में फंड जुटाने में मदद मिल सकेगी। क्योंकि चिकित्सा विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज ही डॉक्टरों को बना रहे हैं। वहां अच्छे एकेडेमीयंस हैं। जिनकी प्राइवेट सेक्टर में भारी मांग है। जब वो प्राइवेट सेक्टर उनकी पहचान को बेच सकता है तो हम क्यों नहीं। इससे अच्छे एकेडेमीयंस को सरकारी सेवाओं में रोका भी जा सकेगा। क्योंकि उन्हें इससे अतिरक्त आय हो सकेगी।

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