खुद भी भ्रम में हैं देशविरोधी रिपोर्ट तैयार करने वाले वार्ताकार

इस सिलसिले में अनुत्तरित सवालों की फेहरिस्त में कुछ सवाल और भी हैं। मसलन, इनके तीसरे साथी व पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी इस बार कहां रह गए ? वे स्वेच्छा से इनसे अलग हो गए हैं या इन दोनों ने कार्यक्रम बनाते हुए उन्हें टोका ही नहीं? तिकड़ी के परस्पर मतभेदों की बात तभी जगजाहिर हो गई थी, जब यह तीनों जम्मू कश्मीर की जटिल पहेली का कोई ‘सरल हल‘ ढूंढने के लिए राज्य में यहां वहां घूम रहे थे। उसी दौरान यह खुलासा हुआ था कि पड़गांवकर व राधा कुमार आई.एस.आई.एजेंट गुलाम नबी फाई व उसके जैसे भारद्रोहियों की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठा चुके हैं।
इस खबर पर अंसारी ने सार्वजनिक रूप से कह डाला था कि ऐसा है तो दुर्भाग्यपूर्ण है। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया था कि ऐसे आरोप उन पर लगते तो वे वार्ताकार दल से तत्काल इस्तीफा दे देते। इस मामले में अंसारी अपनी जगह सही भी थे। इस क्रम में खुद पड़गांवकर को अंततः स्वीकार करना पड़ा था कि वे फाई के भारतविरोधी कश्मीर सम्मेलन में गए थे।
गौरतलब है कि आई.एस.आई. के इसी एजेंट गुलाम नबी फाई को बाद में अमरीका की एक अदालत ने दो साल के कारावास की सजा सुनाई। फाई इन दिनों सजा काट रहा है। कायदे से तो पड़गांवकर और राधा कुमार को वार्ताकार दल में शामिल करने का ही कोई तुक नहीं था चूंकि रॉ को इनकी गतिविधियों की खबर न हो, ऐसा नहीं हो सकता। परंतु फाई का गोरखधंधा उजागर होने के बाद तो इन्हें तत्काल हटाया जाना चाहिए था। इस मामले पर हल्ला होने के बाद भी दोनों को केंद्र सरकार ने वार्ताकार बनाए रखा, यह दीगर बात है।
खैर, खाफी संभावना है कि इस मामले पर अंसारी की मुखरता और अन्य मसलों पर पैदा हुई आपसी खटास ने अंसारी को उनके इन पुराने सहकर्मियों से अब अलग कर दिया हो। यह भी हो सकता है कि सरकार ने ही किसी नए विवाद से बचने के लिए अंसारी को इस प्रक्रिया से अलग रहने का संकेत दे दिया हो। इस मामले में दस्तावेजी स्थिति क्या है,यह केवल गृहमंत्रालय ही साफ कर सकता है।
एक सवाल यह भी है कि फिलहाल इन वार्ताकारों की वैधानिक स्थिति क्या है? इन्हें अब भी वार्ताकार कहा जाए या इन्हें पूर्व वार्ताकार कहें। गृहमंत्रालय के इन दूतों को जम्मू कश्मीर के इनके हालिया दौरे में भाजपा व अन्य विपक्षी दलों ने असल में ‘पूर्व वार्ताकार‘ कह कर ही संबोधित किया। सरकारी कागजों में संभव है कि स्थिति इससे भिन्न हो।
देश को बताया जाना चाहिए कि बतौर वार्ताकार इनका कार्यकाल रिपोर्ट जमा करते ही समाप्त हो गया था या ये उसके बाद भी अब तक वही वेतन-भत्ते-सुविधाएं भोग रहे हैं? रिपोर्ट सौंप देने के बाद कायदे से इनका काम समाप्त हो ही जाना चाहिए था।
सरकार ने छुई तक नहीं रिपोर्ट
महीनों तक इनकी रिपोर्ट को सरकार ने पहले तो छुआ नहीं। फिर छुआ भी तो मानों डरते हुए किसी चिमटे के साथ। उन दिनों संसद का सत्र चालू था, उसे पूरा होने दिया गया। संसद का सत्रावसान होते ही रिपोर्ट को उठाकर मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया। कहा यह कि पहले इस पर देश भर के लोगों की प्रतिक्रिया जानेंगे, फिर सियासी दलों को विमर्श के लिए बुलाएंगे और अंत में सरकार अपना मुंह खोलेगी। इसी प्रक्रिया में वार्ताकारों की नियुक्ति करने वाले गृहमंत्री चिदंबरम ने इस तिकड़ी की देशघाती रिपोर्ट पर ‘इन्फॉर्मड डिबेट‘ में इन्हीं तीनों महानुभावों को बतौर रिसोर्स-पर्सन जाने की सलाह दे डाली थी। मगर सरकारी खर्च पर इनके भारत-भ्रमण के लिए वस्तुतः क्या नियम,शर्तें या कार्यप्रणाली मंत्रालय ने तय की थी, इसकी जानकारी कभी सार्वजनिक नहीं की गई।
याद रहे कि अगस्त के अंत में जम्मू कश्मीर पंहुचने से पूर्व पडगांवकर व राधा कुमार ने मीडिया का बताया था कि वे अपनी रिपोर्ट पर लोगों की राय लेने जा रहे हैं। उनका कहना था कि इस प्रक्रिया में वे यह भी जानना चाहेंगे कि उनसे रिपोर्ट में क्या क्या चूक हो गई ताकि इसमें आवश्यक संशोधन हो सकें? केंद्र सरकार ने क्या इन्हें संशोधन सुझाने के लिए अभी से अधिकृत कर दिया है? रिपोर्ट पर राय कायम किए बगैर सरकार ऐसा करेगी, इसकी संभावना तो नहीं लगती। ऐसे में राधा कुमार और पड़गांवकर रिपोर्ट पर बहस करने के एजेंडे से हटकर इसमें संशोधन सुझाने की डगर पर खुद-ब-खुद क्यूं निकल पडे, यह भी एक गंभीर सवाल है।
लगता यूं है कि वार्ताकारों की मौजूदा हैसियत और एजेंडे को लेकर यह तिकड़ी खुद ही भ्रम में हैं। इनकी कार्यप्रणाली से यह बात शीशे की तरह साफ है। मसलन बीते दिनों श्रीनगर में जब यह विवादास्पद जोड़ी राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मिली तो पक्के तौर पर वार्ताकार की हैसियत से ही मिली होगी। मगर जब इन्होंने लोगों को मिलने के लिए न्यौता भेजा तो इनका रूप बदल चुका था। न्यौते में इन्होंने खुद को उस दिल्ली पॉलिसी ग्रुप के प्रतिनिधि करार दिया जिसकी प्रो. राधा कुमार ट्रस्टी हैं। पूछा जा सकता है कि क्या सरकार ने रिपोर्ट पर फीडबैक लेने के काम दिल्ली पॉलिसी ग्रुप को आउटसोर्स कर दिया है।
खैर, जिस भी हैसियत से ये दोनों फाइल-अनुगामी अपने हालिया जम्मू कश्मीर दौरे पर गए, यह चर्चा करना जरूरी है कि उन्होंने सप्ताह भर तक वहां क्या किया और लोगों ने उनका स्वागत कैसे किया? खबर है कि घाटी के पाक-परस्त अलगाववादियों ने इनका बॉयकाट जारी रखा। न वे पहले इनसे मिले थे और न अब की बार मिले। यह वह तबका है जो भारत से अलग होने की रट छोड़ने को तैयार नहीं और जिसे वार्ताकारों की रिपोर्ट में कही गई बातें भले ही पसंद हैं मगर वे उनके जहरीले सपनों से बहुत कम लगती हैं।
भाजपा भी नकार चुकी थी
भारतीय जनता पार्टी, पन्नुन कश्मीर व सिविल सोसाइटी के दर्जनों भारत-भक्त संगठन इस रिपोर्ट को तो पहले ही नकार चुके थे, पड़गांवकर व प्रो. कुमार के दौरे का भी उन्होंने विरोध किया। जम्मू में तो इस जोड़ी को भाजपाइयों के उग्र प्रदर्शन से खुद को बचाते हुए एकबारगी भागकर सचिवालय में शरण लेनी पड़ी।
मुख्यधारा के दो प्रमुख कश्मीरी दल नेकां और पीडपी, अब तक इनकी रिपोर्ट को नकार रहे थे। मगर मुख्यमंत्री उमर एकाएक बदले बदले नजर आए। उमर को अब वार्ताकारों की रिपोर्ट में ‘उम्मीद की किरण‘ दिखने लगी है। इस किरण का भारत के हितों से कोई संबंध नहीं हो सकता। जानकारों का कहना है कि रिपोर्ट के कारण उमर के मन में अपने दादा शेख अब्दुल्ला वाले हसीन सपने कुलबुलाने लगे हैं। वे सपने जिनके कारण शेख को उनके अपने दोस्त पंडित नेहरू ने बरसों के लिए कारागार में ठूंस दिया था।
उमर के नए रवैये के कारण उन कयासों में भी दम नजर आने लगा है कि जो हो रहा है वह सब दिल्ली और श्रीनगर में पहले से लिख कर वार्ताकारों को थमाई गई एक पटकथा के अनुसार चल रहा है। इसी के अनुसार उमर अब रजामंद हुए हैं और इसका अगला कदम इस देशविरोधी रिपोर्ट को येन केन प्रकारेण लागू करना हो सकता है। यह दीगर बात है कि मॉनसून सत्र में ही गृहराज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद को सूचित किया कि सरकार ने फिलहाल रिपोर्ट को लागू करने के लिए कोई कार्ययोजना तैयार नहीं की है।
लेखक परिचय- लेखक मीडिया शिक्षक व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, लेखक जम्मू कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।
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