भारतीय रेलवे से मुक्त होना चाहती है मेट्रो

सूत्र बता रहे हैं कि मेट्रो की मांग अब हर राज्य में होने लगी है इसलिए वह चाहती है कि उसका काम भी उसी साख से हो जिसको बनाकर आज वह चल रही है। इसके लिए जरूरत है कि नीति निर्माण के मोर्चे पर निर्णय त्वरित गति से हों। पर इसकी कमी भारतीय रेलवे में दिखती है। वहां न सिर्फ लालफीताशाही और लेटलतीफी है बल्कि वहां हर मोर्चे पर विफलता साफ झलकती है। आपको बता दें कि मेट्रो को अपने तकनीकी स्तर पर भारतीय रेलवे का ही मुंह देखना पड़ता है। जिससे मेट्रो का काम प्रभावित होता है। मुंबई मेट्रो से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि तकनीकी तौर पर अब हमलोग किसी भी कीमत पर भारतीय रेलवे के पास नहीं जाना चाहते क्योंकि वहां हमें केवल तारीख पर तारीख मिलती
है। वहीं लखनऊ में भी जब मेट्रो सलाहकार समिति की बैठक हुई थी उस समय भी इस बात पर चर्चा हुई थी कि मेट्रो को रेलवे से अगल हो जाना चाहिए क्योंकि अगले दस सालों में मेट्रो को मुंबई, कोच्चि समेत देश के कई शहर में जाना है। गौरतलब है कि मेट्रो निगमों के लिए निवेश की व्यवस्था केंद्र और संबंधित राज्यों की सरकारें करती हैं, जबकि इनकी देखरेख का जिम्मा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय का है। भारतीय रेलवे की गिनती पिछले कुछ सालों में देश के अपेक्षाकृत खराब प्रबंधन वाले संस्थानों में हो रही है। इसके अफसरों को लगातार संसाधनों की कमी और संकीर्ण राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आरडीएसओ और सीआरएस जैसे रेलवे के विभाग किसी और मंत्रालय से जुड़े कामकाज में कितनी चुस्ती-फुर्ती दिखाते होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है। आने वाले दिनों में मेट्रो के अलावा पटरी पर चलने वाली कुछ और परिवहन व्यवस्थाओं, मसलन मोनो रेल और महानगरों को पड़ोस के शहरों से जोड़ने वाली रैपिड रेलवे ट्रांजिट प्रणाली की शुरुआत होने वाली है। इन सबके तकनीकी और सुरक्षा मामलों को रेलवे के हवाले छोड़ना कुछ ज्यादा ही उलझाव भरा साबित होगा। इसलिए कयास लगाया जा रहा है कि मेट्रो इस मुद्दों को जोरशोर से उठाएगी जिससे उसे भारतीय रेलवे से आजादी मिल सके।












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