वैश्‍य व ब्राह्मण नेताओं से बढ़ीं भाजपा की दूरियां

BJP makes distance with Bhramins, Vaishyas
लखनऊ। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मी कांत वाजपेयी की उपस्थिति में हुई गाली गलौज साबित करती है कि भाजपा में एकता की कमीं है। बीते फरवरी-मार्च माह में राज्य में हुए विधान सभा वुनाव में ब्राह्माण-वैश्य वोटरों को लेकर जो अंतर्कलह शुरू हुई वह आज बढ़ चुकी है। स्थानीय निकाय चुनाव में भी इसका असर साफ दिखायी दिया।

विस चुनाव में मथुरा-वृंदावन विस सीट पर पार्टी द्वारा ब्राह्माण प्रत्याशी डॉ. देवेंद्र शर्मा को जब पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया तो कई लोगों को पार्टी का यह फैसला रास नहीं आया। नाराज होने वालों में अधिकतर वैश्य समाज के नेता थे जो हाल ही पार्टी में शामिल हुए थे। इन असंतुष्ट नेताओं ने भीतरी तौर पर बीजेपी प्रत्याशी का जमकर विरोध भी किया था। जिसका असर चुनाव में दिखायी भी दिया।

विस चुनाव का नतीजा आने के बाद से ही अधिकतर भाजपाई मथुरा-वृंदावन विस क्षेत्र की राजनीति में इन दोनों समाजों के बीच खाई को और गहरा कर दिया। शनिवार को मथुरा के एक आश्रम में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के कार्यक्रम में ब्राह्माण नेताओं कम उपस्थिति ने बताया कि दिया दोनों समाज के प्रतिनिधियों में दरार बढ़ रही और दोनों पक्ष एक दूसरे को देखना पसंद नहीं करते। एक होटल में प्रदेश अध्यक्ष की उपस्थिति में हुई गाली-गलौज की घटना को इसी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

भाजपा की इस राजनीति का असर निकाय चुनाव लड़ रहे पार्टी प्रत्याशियों की सेहत पर कितना पड़ेगा, यह तो परिणाम बतायेगा, लेकिन विरोधी राजनीतिक दलों के साथ-साथ वोटरों के बीच भी ब्राह्माण-वैश्य समाज की राजनीति की चर्चा गर्म है। इस भाजपाई राजनीति के मद्देनजर विप्र समाज के वोटरों को लुभाने में अन्य विपक्षी पार्टियां भी लग गई हैं। देखना यह कि इन वोटरों का झुकाव किस पार्टी की तरफ होता है।

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