अभी भी पुरुषों में है नसबंदी का खौफ: विशेषज्ञ

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इसे जागरूकता की कमी कह लीजिये या समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता का एक और सबूत। लेकिन जनसंख्या विस्फोट की चौतरफा दिक्कतों के बीच आबादी के सरपट दौड़ते घोड़े की नकेल कसने की व्यक्तिगत मुहिम में पुरुषों की भागीदारी महिलाओं के मुकाबले अब भी बेहद कम है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, परिवार नियोजन के ऑपरेशनों के मामले में कमोबेश पूरे देश में गंभीर लैंगिक अंतर बरकरार है। इस सिलसिले में मध्यप्रदेश भी अपवाद नहीं है। सूबे में पिछले पांच सालों के दौरान हुए परिवार नियोजन ऑपरेशनों में पुरुष नसबंदी की भागीदारी सिर्फ सात प्रतिशत के आस-पास रही यानी नसबंदी कराने वाले हर 100 लोगों में केवल सात पुरुष थे।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2007-08 से 2011-12 के बीच प्रदेश में कुल 24,94,293 नसबंदी ऑपरेशन किये गये। इस अवधि में केवल 1,67,830 पुरुषों ने नसबंदी करायी, जबकि 23,26,463 महिलाओं ने परिवार नियोजन के लिए इसको अपनाया। बहरहाल, पिछले तीन दशक में नसबंदी के करीब 2,97,000 ऑपरेशन करने का दावा करने वाले डॉ. ललितमोहन पंत इन आंकड़ों से कतई चकित नहीं हैं।

प्रसिद्ध नसबंदी विशेषग्य पंत ने आज भाषा को बताया, नसबंदी के मामले में कमोबेश पूरे देश में यही हालत है। परिवार नियोजन के ऑपरेशनों को लेकर ज्यादातर पुरुषों की हिचक और वहम अब भी कायम हैं।

पंत के मुताबिक, अक्सर देखा गया है कि महिलाएं अपने तथाकथित पति परमेश्वर के बजाय खुद नसबंदी ऑपरेशन कराने को जल्दी तैयार हो जाती हैं। उन्होंने कहा, परिवार नियोजन शिविरों में मुझे कई महिलाएं बता चुकी हैं कि वे इसलिये यह ऑपरेशन करा रही हैं, क्योंकि उनके पति अपनी नसबंदी कराने को किसी कीमत पर तैयार नहीं हैं।

उधर, नसबंदी ऑपरेशनों को लेकर ज्यादातर पुरुषों की प्रतिक्रिया एकदम उलट बतायी जाती है। पंत ने बताया, हम जब परिवार नियोजन शिविरों में नसबंदी ऑपरेशन के बारे में बात करते हैं, तो ज्यादातर पुरुष अपने यौनांग में किसी तरह की तकलीफ की कल्पना मात्र से सिहर उठते हैं।

सरकारी चिकित्सक ने कहा, ज्यादातर पुरुषों को लगता है कि अगर वे नसबंदी ऑपरेशन करायेंगे तो उनकी शारीरिक ताकत और मर्दानगी कम हो जायेगी, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं होता। बहरहाल, जैसा कि वह बताते हैं कि देश में वर्ष 1998-99 के दौरान एनएसवी (नो स्कैल्पल वसेक्टमी) के रूप में नसबंदी की नयी पद्धति का प्रयोग शुरू होने के बाद इस परिदृश्य में बदलाव की जमीन तैयार होने लगी है।

एनएसवी को आम जुबान में नसबंदी की बिना चीरा, बिना टांका पद्धति कहा जाता है। उन्होंने बताया, ज्यादातर पुरुष लम्बे समय तक परिवार नियोजन ऑपरेशनों से इसलिये भी दूर भागते रहे, क्योंकि नसबंदी की पुरानी पद्धति में बहुत दर्द होता था।

लेकिन एनएसवी सरीखी नयी पद्धति के चलते अब पुरुष झटपट नसबंदी कराके अपेक्षाकृत जल्दी अपने काम पर लौट सकते हैं और इसमें नाम मात्र का दर्द होता है। डॉ. पंत ने कहा कि देश में जनसंख्या नियंत्रण की मुहिम को और प्रभावी बनाने के लिये पुरुष नसबंदी की ओर अपेक्षाकृत ज्यादा ध्यान दिये जाने की जरूरत है।

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