भाजपा में मोदी के कद बढ़ने से नाराज है जदयू

Narendra Modi
दिल्ली(ब्यूरो)। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के भाजपा में कद बढ़ने से पार्टी के भीतर तो घमासान मचा ही हुआ है एनडीए के सहयोगी दल भी इससे कम खफा नहीं हैं। हालांकि अभी कोई इसके खिलाफ खुलकर तो नहीं बोल रहा है पर आने वाले दिनों में मोदी का कद एनडीए में दरार पैदा करने के लिए काफी हो सकता है। एक सूत्र ने बताया कि एनडीए का सबसे बड़ा सहयोगी जदयू मोदी के कद के पबढ़ने से सबसे ज्यादा खफा है। पार्टी के ही एक नेता ने बताया कि भाजपा ने वर्ष 2014 यदि लोकसभा चुनाव के लिए यदि मोदी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तावित किया तो उनके लिए भाजपा के साथ काम करना मुश्किल हो जाएगा।

हम उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री का अपना उम्मीदवार कैसे मान सकते हैं जिसके साथ हम खाना तक नहीं खा सकते। उसका इशारा नीतीश द्वारा वर्ष 2010 में मोदी के लिए आयोजित भोज रद किए जाने के प्रसंग की ओर था। वर्ष 2010 में नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश की तस्वीर वाला विज्ञापन देने पर भी नीतीश ने आपत्ति जताई थी। जदयू के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने जदयू राजग में सबसे लंबे समय से है। यदि इस गठबंधन से जदयू ही निकल जाएगा तो राजग की आत्मा निकल जाएगी। एक अन्य नेता ने कहा कि कई मुद्दों के साथ भाजपा के साथ हमारे विचार नहीं मिलते। ऐसे संकेत मिले हैं कि मोदी को जल्दी ही भाजपा के संसदीय बोर्ड में जगह मिल सकती है। उल्लेखनीय है कि भाजपा की मुंबई कार्यकारिणी की बैठक में नरेंद्र मोदी को लाने के लिए पार्टी ने संजय जोशी जैसे कदावर नेता का इस्तीफा केवल इ लिए ले लिया क्योंकि नरेंद्र मोदी की संजय जोशी के साथ बनती नहीं थी।

हालांकि इस इस्तीफे का ही कमाल था कि सुषमा स्वराज औऱ लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता पार्टी की ही रैली में शामिल नहीं हुए। वैसे चर्चा है कि मुंबई में चर्चाएं खूब हुईं, लेकिन दो दिन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद भाजपा के पास कुछ नहीं था। लेकिन अंदरूनी खींचतान सब पर भारी पड़ गया। संजय जोशी का इस्तीफा जहां निचले स्तर तक संगठन कार्यकर्ताओं के लिए एक झटके जैसा था, वहीं आगे की चुनावी तैयारियों से पहले कार्यकारिणी के पास पीछे मुड़कर देखने की फुरसत नहीं थी। हाल के चुनावी नतीजों पर बैठक में अलग से कोई चर्चा नहीं हुई। जबकि चुनावी नेतृत्व के लिए ममता बनर्जी और मुलायम सिंह का उदाहरण लेकर लौटे। मुंबई में रैली के साथ खत्म हुई भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में कृषि, जम्मू-कश्मीर और गंगा पर कुछ सार्थक बहस जरूर हुई। किसानों के साथ साथ आदिवासियों को जोड़ने की कोशिश हुई।

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