मुआवजे की कफन ओढ़ा हर मौत की कीमत चुका देती है सरकार

Railway Accident
बैंगलूरू। हुबली से बेंगलूरु जा रही हंपी एक्‍सप्रेस ने रेलवे ट्रैक पर मौत का जो खेल खेला उसने पटरी पर ही 16 लोगों की कब्र बना दी। वैसे भारतीय रेल में हादसों की यह खबर नई नहीं हैं। थोड़े वक्‍त के अंतराल पर देश के किसी ना किसी हिस्‍से से ऐसी खबर आ ही जाती है। किसी की मां मरती है तो किसी की पत्‍नी, कोई अपना बेटा गंवा देता है तो कोई अपना सुहाग मगर दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क का दावा करने वाला यह देश सिर्फ आश्‍वासन और मुआवजों तक ही सिमट कर रह जाता है।

हर बार रेलवे के आधुनिकीकरण और सुरक्षा व्‍यवस्‍था दुरुस्‍त करने की बात की जाती है मगर कोशिश हमेशा से शून्‍य रही है। बहुत पुरानी बात नहीं है जब पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को आधुनिकीकरण और किराया बढ़ाने की वजह से इस्‍तीफे की सूली पर चढ़ना पड़ा था। समस्‍या सिर्फ राजनीति की ही नहीं समस्‍या यह है कि अपनी खामियों से हमने सबक कितना लिया? सोचने का वक्‍त है कि जिन परिवारों ने अपनों को खोया है उनके लिये सरकारी खजाने की राहतराशी जारी कर कर्तव्‍य की इतिश्री करना कहां तक उचित है। इधर दुर्घटना घटी, उधर सरकार ने ऐलान भी कर दिया। मृतकों के आश्रितों को 5 लाख, गंभीर रूप से घायलों को 1 लाख और मामूली घायलों को 50 हजार रुपए राहतराशि के रूप में दिए जाएंगे। इसके आगे सरकार के अंदर न तो भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न होने देने की प्रतिबद्धता है और न ही रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए जिम्मेदारी उठाने की कूवत।

पहले हुए बड़े रेल हादसों पर एक नजर

3 दिसंबर 2000- पंजाब में सराय बंजारा और साधुगढ़ स्टेशन के बीच पटरी से उतरी मालगाड़ी से हावड़ा-अमृतसर मेल टकराई, 46 की मौत और 130 से ज्यादा घायल।

22 जून 2001- केरल में कोझिकोड के निकट मेंगलूर-चेन्नई मेल कडालुंडी नदी में गिरी, 40 की मौत और 24 घायल

5 जनवरी 2002- महाराष्ट्र में घटनानंडुर स्टेशन पर खड़ी एक माल गाड़ी से सिकंदराबाद-मनमाड एक्सप्रेस जा भिड़ी, 21 की मौत और 41 घायल

9 सितंबर 2002- बिहार के औरंगाबाद जिले में हावड़ा-दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस की एक बोगी धावे नदी में गिरी, 100 की मौत और 150 घायल

10 सितंबर 2002- बिहार में एक पुल के ऊपर से गुजर रही कोलकाता-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस पटरी से उतरी, 120 की मौत और इतने ही घायल

4 फरवरी 2005- नागपुर में शादी समारोह से लौट रहे ट्रैक्‍टर को तेज रफ्तार रेलगाड़ी ने टक्‍कर मार दी थी। इस हादसे में 52 लोगों की मौत हो गई थी। खास बात यह है कि यह हादसा मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर हुआ था।

1 दिसम्‍बर 2006- बिहार के भागलपुर जिले में 150 वर्ष पुराने एक पुल का हिस्‍सा गिर गया जिससे पुल के उपर से जा रही रेलगाड़ी हादसे का शिकार हो गई। इस हादसे में 35 से ज्‍यादा लोगों की मौत हुई थी जबकि 20 से ज्‍यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गये थे।

16 अप्रैल 2006- तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में थिरुमतपुर के पास मानवरहित क्रासिंग पर हुए हादसे में 12 लोगों की मौत हो गई थी।

23 फरवरी 2009- उड़ीसा के धांगीरा इलाके में एक वैन और रेलगाड़ी की टक्कर होने से 14 लोगों की मौत हो गई। सभी एक शादी समारोह से लौट रहे थे। और मानवरहित क्रासिंग पर वैन अचानक खराब होकर बंद हो गई थी।

14 नवम्‍बर 2009- जयपुर से दिल्‍ली जा रही मांडूरी एक्‍सप्रेस के पटरी से उतर जाने से 7 लोगों की मौत हो गई थी।

21 अक्टूबर 2009- उत्तर प्रदेश के बंजाना में गोवा एक्सप्रेस और मेवाड़ एक्सप्रेस के बीच टक्कर हो जाने से उसमें सवार कम से कम 22 लोगों की मौत हो गई।

9 मार्च 2010- उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में उटारीपुरा के निकट एक मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर एक ट्रैक्टर-ट्रॉली और रेलगाड़ी के बीच टक्कर हो जाने से कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई।

19 जुलाई 2010- पश्चिम बंगाल के सैथिया में वनांचल एक्सप्रेस और उत्तरबंग एक्सप्रेस के बीच टक्कर हो जाने से कम से कम 56 लोगों की मौत हो गई।

3 जून 2010- तमिलनाडु में एक मिनी बस और रेलगाड़ी के बीच टक्कर हो जाने से 5 लोगों की मौत हो गई।

20 सितम्बर 2010- एक रेलगाड़ी और एक मालगाड़ी के बीच टक्कर हो जाने से कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई और 53 घायल हो गए। यह हादसा मध्य प्रदेश के भदरवाह रेलवे स्टेशन पर हुआ था।

22 मई 2010- बिहार के मधुबनी जिले में एक मानव रहित रेलवे क्रासिंग पर हुए रेल हादसे में कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई।

29 जनवरी 2011- कानपुर के भोगनीपुर तहसील में एक मानवरहित रेलवे क्रासिंग के पास जनसाधारण एक्सप्रेस ने एक ट्रैक्टर-ट्रॉली को टक्कर मार दी जिससे 2 लोगों की मौत हो गई।

6 जुलाई 2011- उत्‍तर प्रदेश के कांशीराम नगर जिले में मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर तेज रफ्तार ट्रेन ने बारत से लौट रही बस को टक्‍कर मार दी जिसमें 38 लोगों की मौत हो गई और लगभग 50 से ज्‍यादा लोग गंभीर रूप से जख्‍मी हो गये।

यह महज चंद घटनाएं हैं जो यह बताने के लिये काफी है कि पूर्व की वारदातों के बाद भी रेल प्रशासन ने इस दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाया है। इस दिशा में अगर कुछ हुआ तो वह यह है कि मुआवजे की रकम बढ़ी हैं और पीडि़तों के परिजनों पर मरहम लगाने की कोशिश की गई है। आपका इस संबंध में क्‍या कहना है? हमें जरुर बताईएगा। आप अपनी बात हमतक पहुंचाने के लिये नीचे दिये गये कमेंट बाक्‍स में लिखें।

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