दबी कुचली महसूस करती हैं हरियाणा की महिलाएं

हरियाणा में सरकारी आफिसों में ड्रेस कोड लागू करने का आदेश आते ही पूरे राज्य में चर्चाएं शुरू हो गई हैं। जजों, वकीलों, डाक्टरों, निजी स्कूलों, आईटीआई, विश्वविद्यालयों और पालीटेक्निक संस्थानों में पहले ही ड्रेस कोड लागू है। अब सरकारी दफ्तर में भी वही। सरकार ने यहां तक कह डाला है कि जो भी महिला इस नियम का उल्लंघन करेगी, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
मजेदार बात यह है कि यह ड्रेसकोड सरकार के महिला एवं बाल-विकास विभाग ने जारी किया है। लेकिन विभाग के मंत्री व अधिकारी यह भूल गये कि यह मानवाधिकार का उल्लंघन है। मंत्री गीता भुक्कल का तर्क है कि हर विभाग का ड्रेस कोड होता ही है। इसलिए शालीन ड्रेस कोड मसले पर विवाद नहीं होना चाहिए। यदि इससे कोई आहत हुआ है तो हम आदेश पर पुनर्विचार करने को तैयार हैं।
इस पर दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय में एमए की छात्रा अनीता रावत कहती हैं कि अगर सरकार को यह लगता है कि जींस पहनना वलगर है, तो ऐसा कुछ नहीं है। अगर आप ढंग से साड़ी नहीं पहनेंगी तो वो भी उसमें भी वलगेरिटी झलक ही जायेगी। इसी विश्वविद्यालय में एमकॉम की सृष्टि सिंह कहती हैं कि इस प्रकार के फरमानों से उन परिवारों को बढ़ावा मिलता है जो लड़कियों को दबा कर रखना पसंद करते हैं।
उधर अखिल भारतीय अधिकार संगठन के अध्यक्ष डा. आलोक चांटिया का इस मामले पर कहना है कि स्वतंत्र भारत में किसी भी तरह के एक्सप्रेशन, व्यवहार और कपड़े अनुच्छेद 19 का उल्लंघन है। जहां आप महिलाओं और पुरुषों की बराबरी की बात कर रहे हैं, वहीं ऐसे फरमान जारी करना यह साबित करता है कि महिलाएं आज भी दोयम दर्जे की हैं।












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