रंग दे ने खुशियों से रंग दिये गरीबों के घर

मेरा रंग दे बसंती चोला.... रंग दे, मुझे रंग दे.... ये गीत आपने जरूर सुने होंगे। इन्‍हें सुनते ही आपको भी लगता होगा कि कोई आपके जीवन को भी चमकदार रंगों से रंग दे। आपने कभी सोचा हो या नहीं, लेकिन देश के छोटे-छोटे गांव में रहने वाले लोग जिनके अंदर प्रतिभा कूट-कूट कर भरी होती है, वे जरूर सोचते हैं। इसी सोच और प्रतिभा को ऊपर उठाने के लिए गैर सरकारी संगठन रंग ने ने बीड़ा उठाया है देश के गरीबों को बेहतरीन उद्यमी बनाने का।

Rang De campaign

यहां हम आपको रू-ब-रू करायेंगे कुछ ऐसे लोगों से जिनके जीवन में रंग दे ने वाकई में रंग भर दिये।

1. फातिमा, पलक्‍कड़ केरल

जैसा की हम सभी जानते हैं कि हमारे भोजन में मसाले काफी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केरल के पलक्‍कड़ जिले के एक गांव में फातिमा नाम की महिला दिहाड़ी मजदूर की तरह काम करती थी। उसने मसाले बेचने का काम शुरू किया। उसने स्‍थानीय दुकानों से मसाले खरीदने और फिर उन्‍हें अच्‍छी पैकिंग करके बेचने का काम शुरू किया। इस काम में उसके पति और मां ने भी काफी मदद की। लेकिन फिर भी इतना लाभ नहीं मिल पाता था कि फातिमा के घर को दो वक्‍त की रोटी आसानी से मिल सके।

फातिमा ने एक दिन अपने व्‍यापार को विस्‍तार देने की योजना बनाई। उसने रंग दे से संपर्क किया और उसे 7500 रुपए की आर्थिक मदद मिली। इसके बाद फातिमा ने अपने मसालों का एक ब्रांड स्‍थापित किया और फिर बेचना शुरू किया। इस काम में रंग दे के वॉलेंटियर्स ने उसकी काफी मदद की। देखते ही देखते फातिमा दिन दूनी रात चौगनी तरक्‍की करने लगी। आज स्‍थानीय दुकानदार फातिमा को सर्वोत्‍तम गुणवत्‍ता वाले मसालों में गिनते हैं। उसके बच्‍चे अच्‍छे स्‍कूल में पढ़ने लगे हैं और यहां तक बच्‍चों को ट्यूशन तक की सुविधा देने लगी है।

2. सेल्‍वी, कोयंबटूर, तमिलनाडु।

सेल्‍वी मुरुगन मंदिर के बाहर सॉफ्ट ड्रिंक्‍स का ठेला लगाती थी। मंदिर में आने वाले दर्शनार्थी सेल्‍वी के ठेले पर रुकते और नींबू की शिकंजी पीते और आगे बढ़ जाते। उसका ठेला दिन पर दिन जर्जर होता जा रहा था। सामान रखने तक की जगह नहीं थी। चोरी होने के डर से वो ठेले के बगल में ही सो जाती। उसका बिजनेस दिन पर दिन गिरता जा रहा था। तमाम मुसीबतें झेलने के बाद सेल्‍वी रंग दे के संपर्क में आयी। उसे लोन मिल गया और फिर उसने टूटे ठेले की जगह लकड़ी का मजबूत ठेला खरीदा। इस ठेले में ठंडी बोतलें व बर्फ रखने की ज्‍यादा जगह थी, इसलिए उसने बाजार से और स्‍टॉक खरीद लिया। अब सॉफ्ट ड्रिंक्‍स का स्‍टॉल और भी ज्‍यादा आकर्षक हो गया और ग्राहकों की संख्‍या बढ़ गई। सेल्‍वी अब 500 से 1000 रुपए प्रति दिन कमाने लगी है।

3. सरस्‍वती दास, बुंदू ब्‍लॉक, झारखंड

सरस्‍वती देवी झारखंड की एक 30 वर्षीय साधारण महिला है, जो रांची के बुंदू ब्‍लॉक के गंभारिया गांव में रहती है। यहां की 70 फीसदी जनसंख्‍या कृषि पर निर्भर है। यानी जब बारिश अच्‍छी हुई तब पेट भर के खाना खाया और जब बारिश नहीं हुई तो कई रातें भूखे सोना पड़ा। यही कारण है कि गांव के लोग छह महीना बेकारी काटते हैं। महिलाओं की स्थिति तो और भी बदतर है। खेती के वक्‍त वो अपने पतियों की मदद करने खेत में चली जातीं और जब खेती नहीं होती तब घर में बंध कर रह जातीं।

परिवार का सहयोग मिलने पर सरस्‍वती देवी ने आदिवासी महिला समूह से संपर्क किया और उससे जुड़ गई। वह एक उद्यमी बनने की मंशा के साथ संगठन में आयी। वो घर में जल्‍दी काम खत्‍म करती और ट्रेनिंग पर जाने लगी। वो भी आठ किलोमीटर दूर पैदल चलकर। तमाम लोगों ने उसका मनोबल तोड़ने के प्रयास किये, लेकिन वो नहीं टूटी। रंगदे की मदद से उसे 8000 रुपए का लोन मिला। उसने अक्‍तूबर 2010 में वीएलएससी खोला। देख्‍तो ही देखते वो एक बड़ी उद्यमी बन गई। फरवरी 2011 में रंग दे की सहयोगी संस्‍था उद्योगिनी ने लघु एवं मध्‍यम उद्योग मंत्रालय के सहयोग से एक कार्यशाला का आयोजन किया और करीब 100 महिलाओं को साबुन बनाने के उद्योग से जोड़ा। ये सभी छोटे-छोटे उद्योग आगे चलकर वीएलएससी से जुड़े।

चाहे फातिमा हो या सरस्‍वती और या फिर सेल्‍वी इन लोगों को मिला लोन किसी सरकारी संस्‍था या बैंक से नहीं मिला था। वो लोन रंग दे ने मुहैया कराया था जो कुछ संपन्‍न लोगों ने दिया। वो भी इंटरनेट के माध्‍यम से। रंग दे एक वेब आधारित सामाजिक मुहिम है, जो ग्रामीण उद्यमियो को प्रोत्‍साहित करता है। रंग दे से जुड़ने वाले लोग 100 रुपए से लेकर जितनी इच्‍छा हो उतना पैसा ग्रामीणों की मदद के लिए दे सकते हैं। इस कार्यक्रम का संचालन वेबसाइट www.rangde.org के माध्‍यम से चलता है। अभी तक रंग दे देश के 12 राज्‍यों में 13 हजार लोगों को उद्यम के क्षेत्र में ला चुका है।

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