अन्ना-रामदेव से बचकर कहां भागेगी यूपीए सरकार

अन्ना और बाबा ने शुक्रवार को संयुक्त प्रेसवार्ता बुलाकर मीडिय के माध्यम से सरकार की नींद में खलल डाल दिया। वो नींद जो जन लोकपाल बिल और काले धम को तकिया बनाकर ली जा रही है। अगर इस जंग की तुलना पिछली लड़ाई से करें तो इस बार यूपीए पर दो तरफ से हमला बोला जायेगा। पहली सेना 1 मई को कूच करेगी शिरडी से, जिसकी अगुवाई करेंगे अन्ना। उसी दिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग से बाबा रामदेव की सेना दिल्ली की तरफ कूच करेगी। इससे पहले 3 जून को जंतर-मंतर पर सांकेतिक अनशन पर दोनो बैठेंगे।
इस आंदोलन के प्रभाव
अन्ना और बाबा के इस आंदोलन के दुष्प्रभाव अगर पड़ेंगे तो सिर्फ यूपीए सरकार पर, क्योंकि कहीं न कहीं यह आंदोलन 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस व सहयोगी दलों के वोटबैंक को तोड़ेगा। एक बात पक्की है, अगर यूपीए के घटक दलों को अपने वोट बैंक के प्रति जरा भी खतरा महसूस हुआ तो वो यूपीए का साथ छोड़ने में देर नहीं करेंगे।
ऐसे दलों में सबसे पहला नाम तृणमूल कांग्रेस का आता है, जिसकी मुखिया ममता बनर्जी समय-समय पर यूपीए के नेताओं के कान उमेठती रहती हैं। जाहिर है लोकसभा चुनाव से पहले कई पार्टियां जमीनी स्तर पर सर्वेक्षण जरूर करायेंगी और ऐसे में मुलायम सिंह जैसे लोगों को अगर जरा भी लगेगा कि यूपीए नकारात्मक दिशा में जा रही है, तो वो अपने भविष्य की योजना को कैंसल कर सकते हैं। वह योजना है यूपीए को अंदर से समर्थन देने की।
क्या होगा राहुल गांधी का
यह बात तय है कि जितनी मेहनत कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में की है, उससे कहीं अधिक मेहनत वो लोकसभा चुनाव में करेंगे। ऐसे में अगर बाबा और अन्ना जनता को कांग्रेस के खिलाफ खड़ा करने में सफल हो गये, तो समझिये युवराज का करियर लगभग खत्म हो जायेगा। क्योंकि बिहार, यूपी, पंजाब और गोवा में मिली हार ने राहुल के करियर को पहले ही खतरे में डाल दिया है।












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