...आखिर देश के समलैंगिक कब तक करेंगे इंतजार

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नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकों के साथ भेदभाव के अहम मुद्दे पर ढीले रूख को अपनाने को लेकर आज केंद्र की खिंचाई की और कहा कि इसकी निंदा किये जाने की जरूरत है। न्यायाधीश जी एस सिंघवी तथा एस जे मुखोपाध्याय की पीठ ने सरकार के विभिन्न हलफनामों पर विचार करने के बाद कहा कि केंद्र ने मामले को हल्के में लिया है।

पीठ ने कहा कि उन्होंने मामले को हल्के में लिया है। इस प्रकार के व्यवहार की निंदा किये जाने की जरूरत है और हम इस बारे में अपने फैसले में उल्लेख करने जा रहे हैं। न्यायालय ने कहा कि यह खास मामला है जिसमें सरकार ने उच्च न्यायालय में मामला लड़ने के बाद न्यायालय के समक्ष उदासीन रूख अपनाया है।

पीठ ने कहा कि हमें नहीं पता कि वे कितने मामले में उदासीन हैं। यह खास मामला है जहां केंद्र उच्च न्यायालय में बहस के बाद अब उदासीन रूख अपना रहा है। पीठ ने कहा कि सरकार मामले में तटस्थ रूख के साथ आयी है। किसे स्वीकार किया जाना चाहिए, उच्च न्यायालय में जो हलफनामा दायर किया गया था या शीर्ष अदालत में उदासीन रूख का।

पीठ ने इस बात पर चिंता जतायी कि विधि आयोग की सिफारिश के बावजूद पिछले 60 साल में संसद ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में संशोधन पर विचार नहीं किया है। न्यायालय ने कहा कि विधायिका के पास इन मुद्दों पर विचार के लिये समय नहीं है। आखिर इस देश के लोग कबतक इंतजार करेंगे।

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