कांशीराम की जयंती पर छिनी सत्ता की चाबी

लखनऊ। कांशीराम मानते थे कि सत्ता ही सभी चाबियों की चाबी है और इसके माध्यम से हर ताले को खोला जा सकता है। इस सिद्धांत को लोगों को समझाने वाले बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयन्ती पर ही बसपा के हाथों से सत्ता की चाबी छिन गयी। सत्ता जाने का परिणाम यह रहा कि उनकी जयंती पर गोमती नगर में लगी उनकी आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण के लिए लोग नहीं मिल रहे थे। न उनकी शिष्या मायावती और न ही उनके परिवार का कोई अन्य सदस्य। आए तो बस बसपा के इक्का दुक्का कार्यकर्ता जो जल्दी से मूर्ति पर माला डालकर चलते बने।

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल 1984 को बसपा का गठन करने वाले कांशीराम हमेशा यह कहते थे कि हमेशा किसी भी तरह सत्ता के करीब रहना चाहिये क्योंकि सत्ता ही चाबियों की चाबी है जिससे सभी ताले खुल जाते हैं। गौर करने वाली बात यह रही कि लोहियावादी मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव उसी दिन मुख्यमंत्री पद की शपथ ली जिस दिन कांशीराम का जन्म दिन था। मुलायम सिंह यादव खुद को डाक्टर राम मनोहर लोहिया का अनुयायी मानते हैं जो हमेशा कहा करते थे कि जिंदा कौम पांच साल इन्तजार नहीं किया करती। यानि जनप्रतिनिधि या सरकार यदि उम्मीदों पर खरा नहीं उतरे तो उसे हटा दो।

डाक्टर लोहिया अपने पूरे जीवन इसी सिद्धांत पर चले और केन्द्र की सरकारें उनसे परेशान रहीं। ज्ञात हो कि बसपा की 13 मई 2007 को उत्तर प्रदेश में सरकार बनने के बाद आज उनके जन्मदिन और नौ अक्तूबर निर्वाण दिवस पर बडे कार्यक्रम हुआ करते थे लेकिन आज उनकी जयन्ती पर कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं हुआ। बहुजन समाज प्रेरणा केन्द्र और कांशीराम स्मारक स्थल का नजारा पिछले चार साल तक ऐसा होता था कि लोग उसे देखने को ठहर जाते थे। पूरा प्रेरणा स्थल फूलों से सजता था अधिकारी इंतजामों की देखरेख किया करते थे सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता खुशी मनाते थे।

दोनों स्थलों के अलावा पूरी राजधानी बसपा के नीले झंडों से पट जाती थी। बसपा प्रमुख मायावती मुख्यमंत्री के रूप में जनहित की योजनाओं की घोषणायें किया करती थीं। कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना, कांशीराम विश्वविद्यालय और अन्य योजनायें उनकी जयंती पर आज के ही दिन शुरू हुई लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। कांशीराम स्मारक स्थल और बहुजन समाज प्रेरणा केन्द्र पर आज अपेक्षाकृत सन्नाटा था। बसपा के कुछ कार्यकर्ता उनकी आदमकद मूर्ति पर माला चढाने आये थे। सत्ता नहीं थी तो कार्यक्रम भी सादा था। अंबेडकर परिवर्तन स्थल के पास मायावती के साथ कांशीराम की बनी मूर्ति के पास आज कोई भी नहीं था। आलम यह था कि मायावती आज खुद ही राजधानी लखनऊ में नहीं थीं।

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