जाट आंदोलन के खिलाफ उठने लगे जनता के सुर

हिसार। आरक्षण सहित अन्य मांगों को लेकर रामायण व माइयड़ गांव के बीच रेल पटरियों पर बैठे जाट समुदाय के लोगों का आंदोलन अब धीरे-धीरे औचित्यहीन साबित होता जा रहा है। एक तरफ जहां आंदोलनकारी अपने आंदोलन को तेज करने की रणनीति बना रहे हैं वहीं आम जनता परेशान होकर इस आंदोलन के विरोध में स्वर उठाने लगी है।

पिछले वर्ष जब जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने रामायण गांव में रेल पटरियों पर लगभग एक सप्ताह तक धरना दिए रखा था तो उसके बाद हुई बातचीत में मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने जाट आरक्षण संघर्ष समिति को आश्वासन दिया था कि पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया जाएगा और आयोग जो रिपोर्ट देगा, उसके आधार पर आगामी कार्रवाई की जाएगी।

मुख्यमंत्री के इस आश्वासन पर जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया वहीं मुख्यमंत्री ने भी अपने आश्वासन के अनुसार पिछड़ा वर्ग आयोग गठित कर दिया। पिछड़ा वर्ग आयोग अभी राज्यभर के विभिन्न जिलों में घूम-घूम कर आरक्षण लेने वालों व इसका विरोध करने वालों के दावे व आपत्तियां ले रहा है।

पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य जयसिंह बिश्नोई की माने तो आयोग मार्च माह में अपनी रिपोर्ट सरकार को दे देगा। ऐसे समय में जब पिछड़ा वर्ग आयोग रिपोर्ट एकत्रित कर रहा है और रिपोर्ट सरकार को सौंपे जाने में अभी समय है लेकिन आयोग की रिपोर्ट से पहले ही जाट आरक्षण संघर्ष समिति के एक गुट ने फिर से आंदोलन शुरू कर दिया।

भले ही जाट आरक्षण संघर्ष समिति इस समय दो फाड़ हो चुकी है और एक गुट की ओर से यह आंदोलन चलाया जा रहा है लेकिन जिस समय मुख्यमंत्री से बातचीत हुई थी तो उस समय यह समिति एक ही थी और इस समय आंदोलन कर रहे नेता भी उस बातचीत में शामिल थे। यही नहीं इस समय आंदोलन करने वाले नेताओं ने यह हामी भी भरी थी कि आयोग गठित किया जाए और आयोग की रिपोर्ट के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाए। अब आरक्षण संघर्ष समिति के यशपाल मलिक गुट ने आयोग की रिपोर्ट आने से पहले ही आंदोलन शुरू कर दिया।

अनुशासनहीनता की तरफ बढ़ रहा है आंदोलन

प्रशासन एवं सरकार से बातचीत होने के बावजूद आंदोलनकारी अपनी जिद्द पकड़े हुए हैं लेकिन आंदोलनकारियों की जिद्द का खामियाजा आम जनता को परेशान होकर तथा रेलवे को लाखों का राजस्व गंवाकर भुगतना पड़ रहा है। जाट आरक्षण संघर्ष समिति के नेता कहने को तो दावा कर रहे हैं कि उन्होंने रेलवे ट्रैक नहीं रोक रखे लेकिन जिस दिन प्रशासनिक अधिकारी रेलगाडिय़ां चलवाने का उद्देश्य लेकर आंदोलनकारियों पास गए तो जाट नेताओं के दावों की हवा निकल गई। जाट नेता जहां गाडिय़ां दिलवाने की बात कह रहे थे वहीं आंदोलन स्थल पर बैठे लोग रेलगाडिय़ां चलाने का विरोध कर रहे थे।

भले ही प्रशासन रेलगाडिय़ां चलाने में सफल न हो पाया हो लेकिन प्रशासन के प्रयास ने यह बात अवश्य साबित कर दी कि इस समय जाट नेताओं की आंदोलनकारियों पर कोई पकड़ नहीं है और अब आंदोलन धीरे-धीरे अनुशासनहीनता की तरफ बढ़ रहा है। दूसरी तरफ रेलगाडिय़ां बंद होने से आम जनता परेशान है और इसी परेशानी की वजह स�� आम जनता अब आंदोलनकारियों से कटने लगी है। आम जनता का कहना है कि अपनी मांगे मनवाने के लिए आए दिन जनता को परेशान करना कतई उचित नहीं है।

धरना शुरू करवाने के बाद गायब हुए मलिक

अपने आप को जाट आरक्षण संघर्ष समिति का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताने वाले यशपाल मलिक एक बार फिर से गायब है। गत 19 फरवरी को माइयड़ में रैली करने आए श्री मलिक ने जाट आंदोलनकारियों को धरने पर बैठा दिया लेकिन उसके बाद से वे कहीं दिखाई नहीं दिए। श्री मलिक का गायब होना न केवल आम जनता बल्कि जाट समुदाय में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। पिछली बार आंदोलन के समय भी श्री मलिक ने ऐसा ही किया था जब उन्होंने अपने प्रदेश उत्तर प्रदेश में रेल पटरियों पर बैठे जाटों को यह कहते हुए उठा लिया कि हम हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं लेकिन हरियाणा के मामले में उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को कोई तवज्जो नहीं दी। परिणाम यह हुआ कि हाईकोर्ट के आदेश न मानने व रेलवे ट्रैक रोकने के आरोप में जाट समुदाय के अनेक लोगों पर केस दर्ज हो गए, जिसे आज भी लोग भुगत रहे हैं।

सरकार का लॉलीपॉप भी जिम्मेवार

बार-बार जाट आरक्षण आंदोलन चलने के लिए सरकार भी कम जिम्मेवार नहीं है। बार-बार आंदोलन और उसके बाद केवल आश्वासन का लॉलीपॉप देना कहीं न कहीं सरकार की गलत नीति को ही उजागर कर रहा है। जाट आरक्षण आंदोलन व आंदोलन के समय केवल मा�त्र आश्वासन के सहारे लोगों को टरकाना ही बार-बार आंदोलन की चिंगारी उठने का कारण बन रहा है।

खाप के हाथ में जाट आरक्षण की कमान

हिसार । जाट आरक्षण आंदोलन का आज दसवें दिन भी जारी रहा। अब इस आरक्षण आंदोलन को प्रदेश की खापें संभालेंगी और उनकी तरफ से आगामी रणनीति को समुदाय और अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति को मान्य भी होगा। इस बात में मैयड़ धरनास्थल पर बैठे समुदाय के लोगों ने हाथ खड़े करके सहमति भी जताई। दूसरी तरफ आमरण अनशन पर बैठे समुदाय के चारों लोगों की तबीयत में भी गिरावट आनी शुरू हो गई है। चिकित्सकों की टीम ने उनको अब अस्पताल में दाखिल होकर उपचार कराने की सलाह दी है।

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