'यहां 2 गुजरात हैं', यह एक कमजोर तर्क है

गुजरात को विकास के परिपेक्ष में देखा जाये तो यहां आपको हर क्षेत्र में विकास दिखायी देगा। औधोगिक क्षेत्रों की बात करें तो, जिस तरह से यहां लोगों ने फैक्ट्री लगाने की पेशकश की है वो हैरत अंगेज है। यहीं कृषि क्षेत्र में हर राज्य की तुलना में 11 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी है। यहां का किसान खुश और प्रगतिशील है, यहां का एक छोटा व्यापारी भी शांति और खुशी से अपनी जीविका चला रहा है जिसमें मु्स्लिम भी शामिल हैं। गुजरात ने मुसलमान अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। इसलिए दो गुजरात की बात करना तर्कहीन और बेकार है।
सरकार का माफी माँगने से इनकार
और अंत में टीवी चैनलों और अखबारों में प्रसारित यह खबर कि गुजरात सरकार दंगो पर माफी नहीं मांगेगी, मोदी के खिलाफ गलत प्रचार करने के सिवाय कुछ नहीं है। जबकि एक बार नहीं बल्कि कई बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि अगर वो इस घृणित कार्य के लिए दोषी पाये जाते हैं तो उन्हें फांसी में लटका दिया जाये। अगर वो इस तरह की बातों को हवा देते तो साल 2002 के बाद गुजराती सुरक्षित कैसे रह जाते? कोई मीडिया तंत्र यह नहीं दिखाता कि मोदी के राज्य में 6 करोड़ गुजराती सुरक्षित कैसे रह पाते हैं?
जहां तक माफी का सवाल है तो दो मु्द्दो पर छानबीन करनी चाहिए। पहली साल 2009 और 1984 में हुए आप्रेशन ब्लू स्टार के लिए देश के पीएम मनमहोन सिंह का माफी मांगना। और दूसरा मामला श्रीलंका का है, जहां साल 1983 में तमिल तांडव के बाद चंद्रिका कुमार तुंगा का माफी मांगना। हालांकि यह भी माफी है, लेकिन कभी भी इस बात को मुद्दा बनाकर पेश नहीं किया जाता तो क्यों गोधरा दंगो को हाईलाइट बनाकर पेश किया जाता है। अगर वाकई में गुजरात में विकास नहीं हुआ होता, मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा होता तो कभी भी उपचुनाव में मुस्लिम सीट कथहाल से भाजपा भारी बहुमत से विजयी नहीं होती।
कहने में परहेज नहीं होना चाहिए कुछ मीडिया तंत्र अपनी रोटी सेकने के लिए गुजरात और मोदी दोनों की ऐसी तस्वीर पेश करने में लगे हुए हैं जिसमें सत्यता कम और बेकार की बातें ज्यादा होती है। मीडिया का काम सत्य और सार्थक बातों को लोगों के घरों तक पहुंचाना है लेकिन अफसोस गुजरात के मु्द्गे पर मीडिया यह नहीं कर रहा है। एक बार फिर से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को इस मुद्दे पर सोचने की जरूरत है ताकि जो खबरें प्रसारित हो उसकी सच्चाई लोगों के घरों से होकर गुजरे ना कि टीवी स्टूडियों में बैठकर एक तरफा फैसला लेकर कुछ भी गलत और तर्कहीन कहा जाये।












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