नेत्रहीन अजीत ने जीती आईएएस बनने की जंग

दिल्ली

(ब्यूरो)।
नेत्रहीन
अजीत
ने
आईएएस
बनने
की
जंग
जीत
ली
है।
हालांकि
उसमें
उसे
प्रधानमंत्री
मनमोहन
सिंह
का
सहयोग
मिला
है।
सूत्रों
ने
बताया
कि
हरियाणा
के
महेंद्रगढ़
जिले
के
खेड़ी
गांव
का
रहने
वाले
नेत्रहीन
अजीत
कुमार
को
इस
जंग
को
जितने
में
चार
साल
की
लंबी
लड़ाई
लड़नी
पड़ी।
अब
अजीत
देश
के
दूसरे
नेत्रहीन
आईएएस
बन
गए
हैं।
इससे
पहले
पंचकूला
निवासी
सुखसोहित
सिंह
ने
नेत्रहीन
आईएएस
बनने
का
गौरव
हासिल
किया
था।

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अजीत

2008
में
भारतीय
प्रशासनिक
सेवा
की
परीक्षा
उत्तीर्ण
की
थी।
791
सफल
परीक्षार्थियों
में
उनका
208वां
रैंक
था।
इतनी
अच्छा
रैंक
आने
के
बाद
भी
उन्हें
आईएएस
के
बजाय
आईआरपीएस
दिया
गया
था।
इसे
उन्होंने
स्वीकार
नहीं
किया।
यह
सब
उनके
नेत्रहीन
होने
के
कारण
किया
गया।
उसके
बाद
उन्होंने
अपने
हक
को
पाने
के
लिए
कैट
की
शरण
ली।
कैट
ने
8
अक्टूबर,
2010
को
उनके
हक
में
फैसला
सुनाया।
कैट
ने
निर्देश
दिया
कि
उन्हें
आठ
सप्ताह
में
आईएएस
का
रैंक
दिया
जाए।
फिर
भी
उन्हें
आईएएस
के
पद
के
लिए
नियुक्ति
पत्र
नहीं
दिया
गया।

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उन्होंने

हार
नहीं
मानी
और
सांसद
वृंदा
करात
के
सहयोग
से
29
नवंबर,
2011
को
प्रधानमंत्री
मनमोहन
सिंह
से
मिले।
प्रधानमंत्री
के
हस्तक्षेप
से
उन्हें
16
जनवरी,
2012
को
आईएएस
अफसर
के
रूप
में
नियुक्ति
मिली
है।
14
फरवरी
को
नियुक्ति
पत्र
देकर
20
फरवरी
तक
मंसूरी
में
हाजिर
होने
की
सूचना
दी
गई
है।

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